Namami Gange Programme: देश में सबसे पवित्र माने जाने वाली नदी गंगा के पानी में बैक्टीरिया (जीवाणुओं) की संख्या में भारी भरकम बढ़ोतरी को लेकर एक रिपोर्ट सामने आई है. चिंताजनक बात ये है कि गंगा में बैक्टीरिया की मौजूदगी उत्तराखंड में मिली है, जहां इस नदी का उद्गम स्थल भी है.
2018 और 2023 के बीच उत्तराखंड में नमामि गंगे प्रोग्राम का ऑडिट करते समय अपनी रिपोर्ट में भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) ने – कोलीफॉर्म बैक्टीरिया (Coliform Bacteria) में 32 गुना बढ़ोतरी, सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STPs) में राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (NGT) के नियमों का पालन न करना, 32% सीवेज ट्रीटमेंट प्लांटों द्वारा बिना ट्रीट किए गंदा पानी गंगा में छोड़ना – जैसी चिंताओं को अपनी रिपोर्ट में साझा किया है.
योजना लागू करने में दिक्कत
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, गैरसैंण में हुए बजट सत्र के दौरान बीते मंगलवार (10 मार्च) को उत्तराखंड विधानसभा (Uttarakhand Assembly) में पेश की गई CAG रिपोर्ट में गंगा नदी में प्रदूषण (Pollution in Ganga) को नियंत्रित करने के मकसद से बनाए गए कार्यक्रम को लागू करने में आ रहीं दिक्कतों को उठाया गया है.
भारत सरकार ने 1985 में उत्तर प्रदेश (जिसमें उस समय उत्तराखंड भी शामिल था), बिहार और पश्चिम बंगाल के 25 शहरों में निकलने वाले गंदे पानी को रोकने, मोड़ने और ट्रीट करने के लिए गंगा एक्शन प्लान (Ganga Action Plan) फेज-I शुरू किया था.
परफॉर्मेंस ऑडिट में 2018-2023 के समय में किए गए 42 परियोजनाओं में से 23 और कार्यक्रम के तहत पहले बनाई गई कार्य योजनाओं के संचालन और रखरखाव का परीक्षण किया गया.
खराब गुणवत्ता
चुनी हुईं परियोजनाओं के मूल्यांकन के दौरान राज्य स्वच्छ गंगा मिशन (State Mission for Clean Ganga), लागू करने वाली एजेंसियों (उत्तराखंड पेयजल निगम, सिंचाई विभाग और वन विभाग) और रखरखाव करने वाली एजेंसियों (उत्तराखंड जल संस्थान, सिंचाई और वन विभाग) के रिकॉर्ड की जांच की गई.
ऑडिट में पाया गया कि सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट द्वारा सीवेज ट्रीटमेंट (गंदे पानी को साफ करने की प्रक्रिया) की गुणवत्ता खराब थी.
रिपोर्ट के अनुसार, ‘ज़्यादातर सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट, राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकण या भारत सरकार के नियमों का पालन नहीं कर रहे थे. देवप्रयाग तक गंगा नदी के पानी की गुणवत्ता A कैटेगरी की थी. ऋषिकेश में गुणवत्ता 2019 से 2023 तक B कैटेगरी में रही, सिवाय COVID-19 महामारी के दौरान (2020 और 2021) के, जब यह सुधरकर A कैटेगरी में आ गई थी. हरिद्वार में नदी के पानी की गुणवत्ता पूरे ऑडिट अवधि में लगातार B कैटेगरी में रही.’
A कैटेगरी का पानी कीटाणुशोधन के बाद बिना परंपरागत ट्रीटमेंट के पीने लायक होता है, जबकि B कैटेगरी का पानी सिर्फ बाहर नहाने लायक होता है.
कोलीफॉर्म बैक्टीरिया
रिपोर्ट के अनुसार, ऑडिट में हरिद्वार (Haridwar) में हर-की-पौड़ी (Har-ki-Pauri) और गंगा के उद्गम स्थल देवप्रयाग (Devprayag) में कुल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया के 10 साल के आंकड़ों की भी तुलना की गई. इससे पता चलता है कि देवप्रयाग और हरिद्वार (93 किमी की दूरी) के बीच कुल कोलीफॉर्म का स्तर 32 गुना (अक्टूबर 2023 तक) बढ़ गया. नदी में कोलीफॉर्म बैक्टीरिया बढ़ने का एक बड़ा कारण बिना ट्रीट किए गंदे पानी को गंगा में बहाना है.
ऑडिट रिपोर्ट में आगे कहा गया कि उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (Uttarakhand Pollution Control Board) अपनी प्रयोगशाला के लिए नेशनल एक्रेडिटेशन बोर्ड फॉर टेस्टिंग एंड कैलिब्रेशन लैबोरेटरीज से मान्यता नहीं ले पाया, जो गंगा नदी के पानी की गुणवत्ता और सीवेज ट्रीटमेंट प्लांटों से निकलने वाले अपशिष्ट पदार्थों की निगरानी करता है.

लापरवाही पाई गई
रिपोर्ट में कहा गया, ‘अपशिष्ट निगरानी प्रणाली की निरंतर ऑनलाइन निगरानी कई वजहों से पर्याप्त नहीं थी, जैसे गंगा तरंग पोर्टल (Ganga Tarang Portal) पर मापदंडों की मैन्युअल डेटा एंट्री की इजाज़त है, जिससे आंकड़ों के सटीक होने को लेकर चिंताएं पैदा होती हैं. इसके अलावा गंगा तरंग पोर्टल की आम लोगों तक पहुंच नहीं है, जिससे इसकी पारदर्शिता कम है.’
रिपोर्ट में आगे टेंडर प्रक्रिया में भी लापरवाही पाई गई और यह भी पाया गया कि लागू करने वाली एजेंसी ने ज़ीरो MPN (मोस्ट प्रोबेबल नंबर) प्रति 100 मिलीलीटर के फीकल कोलीफॉर्म को ढील देकर 100 MPN प्रति 100 मिलीलीटर कर दिया था.
प्रबंधन योजना तैयार नहीं
ऑडिट की दूसरी बातों में यह भी शामिल है कि राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन प्राधिकरण आदेश (2016) के नियमों के बावजूद जिला गंगा कमेटियों ने किसी भी जिले (उत्तरकाशी, टिहरी, चमोली, रुद्रप्रयाग, पौड़ी, देहरादून और हरिद्वार) में जिला स्तर पर नदी क्षेत्र प्रबंधन योजना तैयार नहीं की थी, जिनसे होकर गंगा और उसकी सहायक नदियां बहती हैं.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, राज्य सरकार ने ऑडिट रिपोर्ट का जवाब देते हुए कहा कि उधम सिंह नगर जिले के लिए जिला गंगा योजना तैयार की गई है, लेकिन जवाब को मंज़ूर नहीं किया गया, क्योंकि उधम सिंह नगर जिले में कोई गंगा फ्रंट टाउन (गंगा तट पर बसा शहर) नहीं है.
उत्तराखंड सरकार ने नहीं दिया फंड
ऑडिट से यह भी पता चला कि उत्तराखंड सरकार (Uttarakhand Govt) ने गंगा किनारे बसे शहरों में अतिरिक्त सीवेज सुविधाओं को बढ़ाने के लिए फंड नहीं दिया. 2018-23 के दौरान राज्य सरकार ने सीवेज विकास के लिए राज्य क्षेत्र योजनाओं (State Sector Schemes) के तहत स्वच्छता संबंधी बुनियादी ढांचा बनाने पर 55.08 करोड़ रुपये खर्च किए. हालांकि, गंगा किनारे के शहरों में कोई रकम खर्च नहीं की गई.
ऑडिट में पाया गया कि सात शहरों में बने 21 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट किसी भी घर से जुड़े नहीं थे, जिससे वे सिर्फ़ प्रतीकात्मक बनकर रह गए. 37 नमामि गंगे सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट का स्थलीय निरीक्षण करते समय टीम ने देखा कि 12 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट बिना ट्रीट किया हुआ गंदा पानी गंगा और उसकी सहायक नदियों में छोड़ रहे थे, ऐसा इसलिए क्योंकि उनमें गंदे पानी को साफ करने की क्षमता कम थी और नालों की टैपिंग (गंदे पानी की नालियों को रोकने, मोड़ने या सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट से जोड़ने की प्रक्रिया) ठीक से नहीं हो रही थी.




