वकील और पर्यावरण कार्यकर्ता हितेंद्र गांधी ने भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत को एक पत्र लिखकर अपील की है कि अरावली से संबंधित ‘100 मीटर ऊंचाई’ वाले फैसले पर फिर से विचार किया जाए, जिसके तहत इस रेंज की अब सिर्फ उसी पहाड़ को ही अरावली माना जाएगा, जो 100 मीटर या उससे ज़्यादा ऊंचे होंगे.
बीते दिनों सुप्रीम कोर्ट की ओर से दिए गए इस फैसले से विरोध प्रदर्शनों का सिलसिला शुरू हो गया है. हितेंद्र गांधी ने यह पत्र इसी संबंध में लिखा है. उन्होंने भारत के राष्ट्रपति को भी यह पत्र लिखा है, जिसमें उन्होंने कहा है कि ऊंचाई पर आधारित यह संकरा पैमाना अनजाने में पूरे उत्तर-पश्चिम भारत में पर्यावरण सुरक्षा को कमज़ोर कर सकता है.
एनडीटीवी की रिपोर्ट के अनुसार, अपने पत्र में हितेंद्र ने सुप्रीम कोर्ट के बीते 20 नवंबर के आदेश को अरावली रेंज को एक पारिस्थितिक रूप से महत्वपूर्ण प्राकृतिक ढाल के रूप में पहचानने की दिशा में एक महत्वपूर्ण और स्वागत योग्य कदम बताया.
पर्यावरण की चिंता
हालांकि उन्होंने इस आदेश में अपनाई गई संचालनगत परिभाषा (Operational Definition) पर चिंता जताई, जिसके तहत अपने आसपास के इलाके से 100 मीटर या उससे ज़्यादा ऊंचाई वाली बनावट को ही अरावली पहाड़ियों और पर्वत श्रृंखलाओं की पहचान के लिए मुख्य मानदंड माना गया है.
उन्होंने कहा कि इस तरीके से अरावली पर्वत श्रृंखला के बड़े, पारिस्थितिक रूप से महत्वपूर्ण हिस्सों के छूट जाने का खतरा है, जो शायद ऊंचाई की तय सीमा को पूरा न करते हों, लेकिन कार्यात्मक रूप से बहुत महत्वपूर्ण हैं.
पारिस्थितिक महत्व
पत्र में इस बात पर ज़ोर दिया गया कि अरावली एक प्राचीन और बहुत ज़्यादा कटाव वाली पहाड़ी श्रृंखला है, जहां पारिस्थितिक महत्व सिर्फ प्रमुख चोटियों तक ही सीमित नहीं है. कम ऊंचाई वाली पहाड़ियां, चट्टानें, ढलान, गलियारे और पानी रिचार्ज करने वाले इलाके, धूल और मरुस्थलीकरण को रोकने, जैव विविधता को संतुलित करने और दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र की कुल पारिस्थितिक मज़बूती में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.
हितेंद्र गांधी ने चेतावनी दी कि भारत में पर्यावरण सुरक्षा अक्सर कानूनी वर्गीकरण और भूमि रिकॉर्ड से शुरू होती है.
उन्होंने कहा कि एक संकीर्ण परिभाषा ‘ग्रे ज़ोन’ बना सकती है, जहां कानून लागू करना अनिश्चित हो जाता है, जिससे उन इलाकों में ज़मीन के इस्तेमाल में बदलाव, खनन और निर्माण हो सकता है, जो वैज्ञानिक रूप से अरावली पर्वत श्रृंखला का हिस्सा हैं. उन्होंने चेतावनी दी कि ऐसे नतीजों को बाद में बदला नहीं जा सकेगा.
पर्यावरण की रक्षा का कर्तव्य
पर्यावरण कार्यकर्ता ने अपनी दलीलें संवैधानिक सिद्धांतों पर आधारित रखीं, जिसमें अनुच्छेद 21 के तहत स्वस्थ पर्यावरण के अधिकार का हवाला दिया, साथ ही अनुच्छेद 48A और 51A(g) का भी ज़िक्र किया, जो राज्य और नागरिकों पर पर्यावरण की रक्षा करने का कर्तव्य डालते हैं.
पिछले महीने भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई की अध्यक्षता वाली एक पीठ ने घोषणा की थी कि अब केवल वही भू-आकृतियां जो स्थानीय ज़मीन से 100 मीटर या उससे ज़्यादा ऊंची हैं, उन्हें ही ‘अरावली’ माना जाएगा.
यह फैसला पर्यावरण मंत्रालय के तहत गठित एक समिति की सिफारिश के आधार पर लिया गया था. इसका मकसद अरावली की परिभाषा का मानकीकरण करना था, जो गुजरात, राजस्थान, दिल्ली और हरियाणा में फैली हुई है.
नहीं हो सकेगी भरपाई
सुप्रीम कोर्ट के बीते 20 नवंबर के आदेश से पर्यावरणविद और अधिकार कार्यकर्ता नाराज़ हो गए थे. पर्यावरणविदों ने चेतावनी दी थी कि इससे खनन और रियल एस्टेट डेवलपमेंट की लहर आ जाएगी.
उन्होंने कहा था कि इससे पर्यावरण को ऐसा नुकसान होगा जिसकी भरपाई नहीं हो पाएगी – रेगिस्तान बढ़ेगा, ग्राउंडवॉटर रिचार्ज कम हो जाएगा और प्रदूषण तथा पानी की कमी से जूझ रहे इस इलाके की जैव विविधता खत्म हो जाएगी.
केंद्र सरकार ने क्या कहा
बहरहाल इस फैसले पर उठे सवालों के बीच केंद्र सरकार ने घोषणा की है कि अरावली क्षेत्र का 90 प्रतिशत हिस्सा अब ‘सुरक्षित’ रहेगा और इस क्षेत्र में नए खनन पट्टे पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला दिया है.
अपने एक इंटरव्यू के कई वीडिया क्लिप एक्स अकाउंट पर शेयर करते हुए मंगलवार (23 दिसंबर) को पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने लिखा है, ‘अरावली पूरी तरह से बचेगी, सुरक्षित रहेगी, संरक्षित रहेगी. यह मेरा वादा नहीं, यह मेरी प्रतिबद्धता है और यह प्रधानमंत्री जी का संकल्प भी है. (सुप्रीम कोर्ट का) यह निर्णय अरावली में अवैध खनन को रोकने, माइनिंग क्षेत्रों की पहचान करने, जिला-वार डेटा तैयार करने और जिला-वार अरावली को चिह्नित करने के लिए दिया गया है.’
अरावली पूरी तरह से बचेगी, सुरक्षित रहेगी, संरक्षित रहेगी। यह मेरा वादा नहीं, यह मेरी प्रतिबद्धता है और यह प्रधानमंत्री जी का संकल्प भी है।#AravalliIsSafe pic.twitter.com/TiYyJl4Tvr
— Bhupender Yadav (@byadavbjp) December 23, 2025
बीते 21 दिसंबर को किए गए एक पोस्ट में पर्यावरण मंत्री ने कहा है, भ्रम फैलाना बंद करें! अरावली के कुल 1.44 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में मात्र 0.19% हिस्से में ही खनन की पात्रता हो सकती है. बाकी पूरी अरावली संरक्षित और सुरक्षित है.
भ्रम फैलाना बंद करें!
अरावली के कुल 1.44 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में मात्र 0.19% हिस्से में ही खनन की पात्रता हो सकती है।
बाकी पूरी अरावली संरक्षित और सुरक्षित है।#AravalliIsSafe pic.twitter.com/ojbaqtlniG
— Bhupender Yadav (@byadavbjp) December 21, 2025
इससे पहले उन्होंने कहा था, ‘अरावली क्षेत्र की सुरक्षा के संबंध में कोई छूट नहीं दी गई है’ और दावा किया कि इस मुद्दे पर ‘झूठ’ फैलाया गया है. X पर एक पोस्ट में केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा, ‘NCR के अंदर अरावली रेंज में माइनिंग की अनुमति नहीं है, जिसमें दिल्ली, गुरुग्राम, फरीदाबाद, नूंह और अलवर के कुछ हिस्से शामिल हैं.’
खनन के लिए मैनेजमेंट प्लान
तत्कालीन CJI जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस के. विनोद चंद्रन और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने पर्यावरण मंत्रालय से अरावली रेंज के संरक्षण और परिभाषा से जुड़े एक मामले के संबंध में पूरी अरावली रेंज के लिए ‘सस्टेनेबल माइनिंग के लिए मैनेजमेंट प्लान’ तैयार करने को कहा था.
खनन पर प्रतिबंध के बारे में शीर्ष अदालत ने कहा था कि खनन पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाने से अवैध खनन गतिविधियां हो सकती हैं और इसलिए अरावली पहाड़ियों और रेंज में पहले से चल रही मौजूदा कानूनी खनन गतिविधियों पर ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं लगाया गया है.
अदालत का निर्देश
अदालत ने निर्देश दिया कि जब तक ‘सस्टेनेबल माइनिंग के लिए मैनेजमेंट प्लान’ को अंतिम रूप नहीं दिया जाता, तब तक कोई नया खनन पट्टा नहीं दिया जाएगा और एक बार अंतिम रूप देने के बाद ‘सस्टेनेबल माइनिंग के लिए मैनेजमेंट प्लान’ के अनुसार खनन की अनुमति दी जाएगी.
अदालत के फैसले भी अरावली पहाड़ियों और रेंज में नए खनन पट्टे देने पर रोक लगाते हैं, जिसमें केवल महत्वपूर्ण, रणनीतिक और परमाणु खनिजों के लिए ही छूट है.




