माओवादी हिंसा से 31,000 से अधिक लोग विस्थापित हुए: छत्तीसगढ़ सरकार का सर्वे

(प्रतीकात्मक फोटो साभार: Pixabay)

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माओवादी संघर्ष के बाद बस्तर क्षेत्र से आदिवासियों के पड़ोसी आंध्र प्रदेश और तेलंगाना राज्यों में चले जाने के दो दशक बाद छत्तीसगढ़ सरकार के एक सर्वेक्षण में अनुमान लगाया गया है कि राज्य के आंतरिक रूप से विस्थापित लोगों की संख्या 31,098 है.

इस सर्वे में वे लोग भी शामिल हैं, जो 2000 के दशक में अपने घर छोड़कर भाग गए थे – जब छत्तीसगढ़ में आतंकवाद विरोधी अभियान जिसमें सलवा जुडूम भी शामिल था, अपने चरम पर था. इस सर्वे रिपोर्ट को हाल ही में राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) को प्रस्तुत किया गया है.

3 साल बाद हुआ सर्वे

यह रिपोर्ट तब तैयार की गई, जब आयोग ने 19 जनवरी को एक बार फिर राज्य सरकार से छत्तीसगढ़ में आंतरिक रूप से विस्थापित लोगों का सर्वे करने का आग्रह किया था.

इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, मार्च 2022 में आंतरिक रूप से विस्थापित लोगों के एक संगठन द्वारा आयोग से संपर्क करने के तीन साल बाद ऐसा किया गया. संगठन ने आरोप लगाया गया था कि तेलंगाना और आंध्र प्रदेश की सरकारें वन क्षेत्रों में ‘उनकी जमीनें छीन रही हैं’.


क्या कहते हैं आंकड़े

फरवरी में सरकार को सौंपे गए नवीनतम सर्वेक्षण के अनुसार, छत्तीसगढ़ के 31,098 आंतरिक रूप से विस्थापित लोगों में से 20,455 तेलंगाना में और 10,643 आंध्र प्रदेश में हैं. राज्य सरकार के एक अधिकारी ने कहा कि यह संख्या बढ़ सकती है.

बीजापुर, सुकमा और दंतेवाड़ा के 651 गांवों के कुल 6,939 परिवार विस्थापित हुए हैं. इनमें से 22,813 सुकमा से, 5,063 बीजापुर से और बाकी 3,222 दंतेवाड़ा से हैं.


पुनर्वास के लिए बनी समिति

इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में आदिवासी विकास विभाग के प्रमुख सचिव सोनमणि बोरा ने बताया, ‘इस साल फरवरी में आंतरिक रूप से विस्थापित लोगों को छत्तीसगढ़ में फिर से बसाने के लिए एक मजबूत पुनर्वास योजना बनाने के लिए एक समिति का गठन किया गया था.’

सितंबर 2025 में इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया था कि कई राज्यों ने छत्तीसगढ़ के आतंरिक रूप से विस्थापित लोगों के भूमि अधिकारों को मान्यता देने से इनकार कर दिया है, जबकि राज्य सरकार ने ऐसे लोगों की संख्या 13,000 से अधिक बताई थी. तब आयोग ने महसूस किया था कि यह आंकड़ा ‘बहुत कम’ है और एक नए सर्वेक्षण का आग्रह किया था.

लंबी संघर्ष

माओवादी आंदोलन को समाप्त करने के लिए केंद्र सरकार की 31 मार्च की समय सीमा नजदीक आने के बाद यह घटनाक्रम सामने आया है.

बहरहाल आदिवासी कार्यकर्ताओं ने इस घटनाक्रम का स्वागत किया है. आदिवासी कार्यकर्ता शुभ्रांशु चौधरी कहते हैं, ‘यह अच्छी खबर है. विस्थापितों को यहां तक ​​पहुंचने के लिए कई वर्षों की लंबा संघर्ष करना पड़ा.’

साल 2019 में चौधरी ने छत्तीसगढ़ के आंतरिक रूप से विस्थापित लोगों के सर्वे की मांग करते हुए राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग में याचिका दायर की थी. उन्होंने कहा, ‘आयोग की सलाह के अनुसार आंतरिक रूप से विस्थापित लोगों के लिए पुनर्वास योजना को अंतिम रूप देने के लिए गृह मंत्रालय को सभी संबंधित राज्यों को एक साथ लाने का नेतृत्व करना चाहिए.’

पुनर्वास का विकल्प हो

बीते 25 फरवरी को केंद्र सरकार को लिखे अपने पत्र में आयोग ने मिजोरम और त्रिपुरा में ब्रू-रियांग समझौते की तर्ज पर इस मुद्दे को ‘स्थायी रूप से हल करने’ का आग्रह किया था, जहां आदिवासियों के पास या तो अपने गृह राज्य में या जिस राज्य में वे बसे हैं, पुनर्वास का विकल्प हो. आयोग ने जनजातीय मामलों के मंत्रालय से वन अधिकार अधिनियम से संबंधित मामलों पर राज्यों के साथ समन्वय करने का भी अनुरोध किया था.

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