देश के गरीब से गरीब तबके को काम की गारंटी ने वाले मनरेगा (MGNREGA) में बदलाव के लिए केंद्र सरकार की ओर से लाए जा रहे ‘विकसित भारत – गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण)’ यानी VB – G RAM G विधेयक का विरोध शुरू हो गया है. आरोप है कि नया विधेयक, मनरेगा की मूल भावना को खत्म कर देगा.
इस विधेयक की कड़ी निंदा करते हुए नरेगा संघर्ष मोर्चा (NSM) की ओर से कहा गया है कि यह विधेयक मजदूरों के अधिकारों पर हमला है. इसे मजदूरों या उनके संगठनों से बिना किसी बातचीत के लाया गया है. यह विधेयक पुराने मनरेगा कानून (2005) को खत्म कर देगा और रोजगार की गारंटी को सरकार की मर्जी पर चलने वाली एक सीमित योजना बना देगा.
केंद्र को ताकत देगा
बीते 17 दिसंबर को दिल्ली के प्रेस क्लब में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस हुई, जिसका संचालन सामाजिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव ने किया. इस दौरान अर्थशास्त्री जयती घोष ने जोर देकर कहा, ‘नया विधेयक भारत के संघीय ढांचे के लिए बहुत खतरनाक है. केंद्र सरकार अक्सर फंड का इस्तेमाल राज्यों को ‘इनाम’ देने या ‘सजा’ देने के लिए करती है. मनरेगा को सबको साथ लेकर चलने के लिए बनाया गया था, लेकिन नया विधेयक केंद्र को पूरी ताकत देता है कि वह खुद तय करे कि काम कहां होगा और क्या होगा.’
उन्होंने आगे कहा, ‘सबसे खतरनाक बात यह है कि केंद्र बजट की एक सीमा तय कर देगा, जिसके बाद का सारा खर्चा राज्यों को उठाना होगा. इससे उन गरीब राज्यों पर सबसे बुरा असर पड़ेगा, जहां मनरेगा की सबसे ज्यादा जरूरत है.’
केंद्र सरकार पर उठाए सवाल
अर्थशास्त्री और सामाजिक कार्यकर्ता ज्यां द्रेज ने कहा, ‘अगर भारत में कोई ऐसा कानून है, जिसकी वजह से भारत को ‘विश्वगुरु’ कहा जा सकता है, तो वह मनरेगा है.’ उन्होंने विधेयक के जरिये केंद्र को मिलने वाली असीमित ताकतों पर सवाल उठाए.
उन्होंने याद दिलाया कि कैसे बंगाल में 2021 से काम बंद है और तकनीक के नाम पर मजदूरों को बाहर किया जा रहा है. उन्होंने कहा कि यह नया विधेयक अगर वापस नहीं होता और नरेगा मजबूत नहीं होता, हम विरोध को मजबूर होंगे.
मजदूर किसान शक्ति संगठन (MKSS) और राजस्थान असंगठित मजदूर यूनियन से जुड़े मुकेश निर्वासित ने नए विधेयक की धाराओं के बारे में बताया कि कैसे यह बिल ‘काम के अधिकार’ को छीनकर एक ऐसी खोखली गारंटी दे रहा है, जिसे निभाने के लिए सरकार कानूनी रूप से मजबूर नहीं है.
महिलाओं के जीवन को बेहतर बनाया
नेशनल फेडरेशन फॉर इंडियन वुमन (NFIW) की उपाध्यक्ष और मजदूर अधिकार कार्यकर्ता एनी राजा ने कहा कि समाज के हर तबके की महिलाओं, भूमिहीनों, पिछड़े लोगों और युवाओं ने मिलकर इसके लिए लड़ाई लड़ी थी. उन्होंने खास तौर पर बताया कि मनरेगा ने महिलाओं को ‘समान वेतन’ और ‘आर्थिक आजादी’ देकर उनके जीवन को बेहतर बनाया है.
जेएनयू के वरिष्ठ प्रोफेसर और केरल योजना बोर्ड के पूर्व उपाध्यक्ष प्रभात पटनायक ने जोर देकर कहा कि जब गांवों में संकट का समय होता है, तब ‘रोजगार की गारंटी’ का अधिकार सबसे अहम भूमिका निभाता है.
फूट डालने की कोशिश
अखिल भारतीय कृषि मजदूर संघ के बी. वेंकट ने कहा, ‘सरकार मनरेगा मजदूरों और किसानों के बीच फूट डालने की कोशिश कर रही है. हकीकत यह है कि मनरेगा से खेती के काम पर कोई बुरा असर नहीं पड़ता, बल्कि छोटे किसान और कारीगर भी मजदूरों के इस संघर्ष में साथ हैं.’
उन्होंने कहा, ‘यह नया विधेयक भारत में फिर से एक तरह की बंधुआ मजदूरी और सामंती व्यवस्था पैदा कर देगा और यह उन सकारात्मक प्रभावों को भी खत्म कर देगा जो मनरेगा ने ग्रामीण मजदूरी को बढ़ाने में डाले हैं.’
सरकार की मर्जी पर मिलेगा काम
● हक से हटकर सरकारी मर्जी तक: मनरेगा को खत्म करने का मतलब है कि अब रोजगार पाना आपका ‘अधिकार’ नहीं रहेगा, बल्कि यह सरकार की मर्जी पर चलने वाली एक साधारण ‘योजना’ बन जाएगी. यह ‘मांग’ पर नहीं, बल्कि सरकार की ‘सप्लाई’ पर निर्भर करेगी.
● सिर्फ चुनिंदा इलाकों में काम: काम का अधिकार अब सिर्फ उन ग्रामीण इलाकों तक सीमित रहेगा, जिन्हें केंद्र सरकार चुनेगी. जिन इलाकों का नाम सरकार की लिस्ट में नहीं होगा, वहां के मजदूरों को काम की कोई गारंटी नहीं मिलेगी.
● काम के दिनों पर रोक: केंद्र सरकार राज्यों के लिए एक बजट (Normative Allocation) तय कर देगी, जिससे काम के दिनों पर एक सीमा लग जाएगी. अगर काम की मांग उस बजट से ज्यादा होती है, तो उसका खर्च राज्य सरकार को उठाना होगा. ऐसा माना जा रहा है कि इस तरीके से बीजेपी शासित राज्यों को फायदा पहुंचाया जाएगा और दूसरे राज्यों का नुकसान होगा.
सिर्फ 60 प्रतिशत खर्च देगा केंद्र
● मजदूरी का बोझ राज्यों पर: नए नियम के मुताबिक खर्च का बंटवारा 60 और 40 के अनुपात में होगा. यानी केंद्र खर्च का 60 प्रतिशत हिस्सा देगी और बाकी 40 प्रतिशत खर्च राज्यों को उठाना होगा. इसका मतलब है कि केंद्र सरकार अब पूरी मजदूरी देने की जिम्मेदारी से पीछे हट रही है. इससे गरीब राज्यों पर भारी आर्थिक बोझ पड़ेगा, वहां काम कम होगा और मजबूरी में लोगों को पलायन करना पड़ेगा.
● 2 महीने काम की तालाबंदी (Blackout Period): खेती के मुख्य सीजन के दौरान साल में 60 दिनों तक मनरेगा का काम पूरी तरह बंद रखा जाएगा. इससे महिलाओं, भूमिहीन मजदूरों और पिछड़े वर्गों की कमाई और उनकी सौदा शक्ति पर बुरा असर पड़ेगा.
अधिकारों के खिलाफ
● ग्राम सभाओं की ताकत खत्म: अब गांवों के काम ग्राम सभा की योजना से नहीं, बल्कि ‘पीएम गति शक्ति योजना’ से जुड़े ‘विकसित ग्राम पंचायत योजना’ के जरिये तय होंगे. यह पंचायतों की आजादी और 73वां संवैधानिक संशोधन में मिले अधिकारों के खिलाफ है.
● तकनीक का अनावश्यक कब्जा: मजदूरों और कर्मचारियों के लिए बायोमेट्रिक जांच बढ़ाई जा रही है, जबकि यह साबित हो चुका है कि डिजिटल हाजिरी (NMMS) और आधार पेमेंट (ABPS) जैसी तकनीकों की वजह से बहुत से मजदूर काम और पैसे से वंचित रह जाते हैं. भ्रष्टाचार रोकने का असली तरीका तकनीक नहीं, बल्कि ग्राम सभा द्वारा की जाने वाली जांच (सामाजिक अंकेक्षण) है.
जनविरोधी विधेयक
प्रेस कॉन्फ्रेंस में शामिल लोगों ने कहा कि मनरेगा को रद्द करने वाला विकसित भारत – गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) (VB-G RAM G) विधेयक कोई सुधार नहीं है, बल्कि यह उन संवैधानिक गारंटियों को वापस छीनने की कोशिश है, जिन्हें मजदूरों ने दशकों के कड़े संघर्ष के बाद हासिल किया था.
नरेगा संघर्ष मोर्चा की ओर से कहा गया है कि संगठन स्पष्ट रूप से इस विधेयक को खारिज करता है और इसे तुरंत वापस लेने की मांग करता है. मोर्चा ने 19 दिसंबर 2025 को ‘राष्ट्रीय विरोध दिवस’ घोषित किया है. इस दिन ग्रामीण और कृषि मजदूर इस जनविरोधी विधेयक के खिलाफ राष्ट्रीय, राज्य, जिला और स्थानीय स्तर पर विरोध करेंगे, ताकि केंद्र की एनडीए (NDA) सरकार को इसे वापस लेने के लिए मजबूर किया जा सके.




