माधव गाडगिल: पश्चिमी घाट के पर्यावरण संरक्षण के लिए आवाज़ उठाने वाला पुरोधा

माधव गाडगिल. (फोटो साभार: विकिपीडिया)

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पारिस्थितिक विज्ञान (Ecology) के क्षेत्र में पुरोधा माने जाने वाले मशहूर पर्यावरण संरक्षक माधव गाडगिल अब हमारे बीच नहीं रहे. 7 जनवरी 2026 को महाराष्ट्र के पुणे शहर में 83 साल की उम्र में उन्होंने अंतिम सांस ली.

वह भारत में पारिस्थितिकी और पर्यावरण संरक्षण पर सबसे प्रमुख आवाज़ों में से एक थे. बेंगलुरु में इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस (IISc) में लंबे समय तक सेवा देकर रिटायर होने के बाद गाडगिल अपने शहर पुणे लौट आए थे. अपनी जिंदगी के आखिरी दिनों तक वह लोगों से बड़े पैमाने पर जुड़े रहे और भारत की विकास यात्रा की पारिस्थितिकी पर पड़ने वाले दबावों और प्रभावों के बारे में नियमित रूप से लिखते रहे.

Champions of the Earth Award

पश्चिमी घाट (Western Ghats) के पारिस्थितिकीय महत्व पर अपने काम के लिए उन्हें महत्वपूर्ण रूप से जाना जाता है. साल 2024 में संयुक्त राष्ट्र (United Nations/UN) ने उन्हें पश्चिमी घाट, जो एक वैश्विक जैव विविधता (Biodiversity) का केंद्र है, में उनके बेहतरीन काम के लिए सालाना Champions of the Earth अवॉर्ड से सम्मानित किया था, जो UN का सबसे बड़ा पर्यावरण सम्मान है.

गाडगिल को 1981 में पद्मश्री और 2013 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था. वैश्चिक स्तर पर उन्होंने एनवायरनमेंटल अचीवमेंट के लिए टायलर पुरस्कार और वोल्वो एनवायरनमेंट पुरस्कार जीता है.


लोगों के खिलाफ काम

साल 2025 में द हिंदू को दिए अपने इंटरव्यू में उन्होंने पश्चिमी घाट में हुईं आपदाओं पर चिंता जताते हुए कहा था कि आपदाओं से बचने के लिए रिपोर्ट में दी गईं सभी सिफारिशें बहुत ज़रूरी हैं.

उन्होंने कहा था, ‘हमने देखा कि लोगों पर एक खास तरह का विकास मॉडल थोपा जा रहा है: खनन अभियान और प्रदूषण फैलाने वाले उद्योग को लोगों की मर्ज़ी के बिना उन पर थोपा जा रहा था. साथ ही संरक्षण की कोशिशों को भी वन विभाग द्वारा तानाशाही तरीके से थोपा जा रहा था, जो अक्सर निर्दयतापूर्ण और लोगों के खिलाफ काम करता था.’

पश्चिमी घाट को लेकर उनकी रिपोर्ट में बहुत ज़्यादा संवेदनशील इलाकों (Sensitive Zones) के बारे में सख्त पाबंदियों के लिए कई सुझाव शामिल थे. इसमें सुझाव दिया गया था कि कोई नई सड़क या भवन बनाने की अनुमति न दी जाए, खड़ी ढलानों पर कोई विकास न हो और पत्थर की खदानों पर रोक लगाई जाए, आदि.


पढ़ाई-लिखाई

गाडगिल का जन्म 1942 में पुणे में प्रमिला और धनंजय गाडगिल के घर हुआ था. पुणे के फर्ग्यूसन कॉलेज से जीव विज्ञान की पढ़ाई करने और मुंबई विश्वविद्यालय से इसी विषय में मास्टर डिग्री लेने के बाद गाडगिल ने अमेरिका की Harvard University में मैथमेटिकल इकोलॉजी में थीसिस के साथ बायोलॉजी में PhD की.

हार्वर्ड में दो साल तक बायोलॉजी पढ़ाने के बाद वह भारत लौट आए और 1971 में IISc में शामिल हो गए, जहां उन्होंने 2004 में संस्थान के चेयरमैन के तौर पर रिटायर होने तक काम किया था. यह 1982 में IISc में हुआ था, जब गाडगिल ने नए बने पर्यावरण विभाग में पहले सेंटर फॉर इकोलॉजिकल साइंसेज (CES) की स्थापना की थी.

पश्चिमी घाट क्षेत्र में आने वाले नीलगिरि बायोस्फीयर रिज़र्व का एक दृश्य. (फोटो साभार: विकिपीडिया)

पारिस्थितिकी पर अध्ययन

इससे पहले, उन्होंने कई बड़े फील्ड स्टडी किए थे, जिनमें बांदीपुर टाइगर रिज़र्व में जंगल की पारिस्थितिकी पर एक अध्ययन से लेकर कर्नाटक में बांस के संसाधनों की पारिस्थितिकी और प्रबंधन पर दूसरा अध्ययन शामिल था. दक्षिण भारत में संरक्षित क्षेत्रों पर अपने सहयोगियों के साथ उनके फील्ड वर्क की वजह से आखिरकार 1986 में नीलगिरी बायोस्फीयर रिज़र्व की स्थापना हुई.

उनके पिता धनंजय गाडगिल एक जाने-माने अर्थशास्त्री और भारत के (पूर्व) योजना आयोग के उपाध्यक्ष थे, जो महाराष्ट्र में किसानों के सहकारी आंदोलन को आगे बढ़ाने में अपने काम के लिए जाने जाते थे.


पश्चिमी घाट के लिए काम

माधव गाडगिल ने चार दशकों से ज़्यादा समय तक पश्चिमी घाट में स्थानीय समुदायों के साथ काम किया. उन्होंने 1986 में पहले बायोस्फीयर रिज़र्व प्रोजेक्ट के प्रस्ताव में अहम भूमिका निभाई थी और जैव विविधता अधिनियम 2003, वन अधिकार अधिनियम 2006 में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया.

गाडगिल एक ऐसे पारिस्थितिकीविद् थे, जिन्होंने हाशिये पर पड़े समुदायों के अधिकारों की वकालत की, जिनके लिए जंगल ही उनका घर था. उन्होंने उन्हें ‘भारत के आम लोग’ कहा और उन्हें ‘पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) का हिस्सा’ माना.


7 किताबें और 225 से ज़्यादा लेख

माधव गाडगिल एक लेखक, शोधकर्ता, विद्वान और स्तंभकार थे. अपने लंबे करिअर में उन्होंने उद्विकास, पारिस्थितिकी, संरक्षण जीव विज्ञान, मानव पारिस्थितिकी और पारिस्थितिक इतिहास पर 225 से ज़्यादा शोध आधारित लेख प्रकाशित किए. इसके अलावा 7 किताबें भी लिखी थीं. प्रो रामचंद्र गुहा के साथ मिलकर उन्होंने दो किताबें लिखी थी. इनके नाम This Fissured Land: An Ecological History of India (1992) और The Use and Abuse of Nature in Contemporary India (1995) हैं.

एक लेख में प्रो. रामचंद्र गुहा लिखते हैं, पुणे में जन्मे गाडगिल ने बॉम्बे और हार्वर्ड में पढ़ाई की, जहां उन्होंने पारिस्थितिकी विज्ञान में PhD की और बाद में पढ़ाया भी. 1970 के दशक की शुरुआत में उन्होंने और उनकी पत्नी सुलोचना (जिन्होंने हार्वर्ड से गणित में PhD की थी) ने अमेरिका में अपने वैज्ञानिक करिअर की प्रतिष्ठा और आराम को छोड़कर भारत में काम करने का फैसला किया.

सेंटर फॉर इकोलॉजिकल साइंसेज

खुशकिस्मती से उनकी प्रतिभा और जुनून को इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस (IISc) के दूरदर्शी डायरेक्टर सतीश धवन (Satish Dhawan) ने पहचाना, जिन्होंने उन्हें इंस्टिट्यूट के बैंगलोर कैंपस में दोनों को पद दिया. वहां, सुलोचना ने मानसून पर खुद महत्वपूर्ण काम करते हुए वायुमंडलीय विज्ञान (Atmospheric Science) के लिए एक सेंटर स्थापित करने में मदद की. वहीं, माधव ने पारिस्थितिक विज्ञान के लिए एक सेंटर (सेंटर फॉर इकोलॉजिकल साइंसेज) की स्थापना की और इस दौरान कुछ बेहतरीन युवा वैज्ञानिकों को पढ़ाया और सिखाया भी.

उनके अनुसार, इकोलॉजिस्ट माधव गाडगिल की पत्नी वायुमंडलीय वैज्ञानिक सुलोचना गाडगिल का जुलाई 2025 में निधन हो गया. ये दोनों एक असाधारण जोड़ा थे, दोनों अपने-अपने क्षेत्र में समान रूप से प्रतिष्ठित थे. वे शानदार विद्वान होने के साथ-साथ उदार इंसान भी थे. दोनों देशभक्त थे, जो अपने देश के प्रति अपने प्यार को बहुत सहजता से दिखाते थे.


इंसानी अधिकारों को अहमियत

द हिंदू की एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार, माधव गाडगिल ने वैश्विक संरक्षणवादी विमर्श में सोच का तरीका बदल दिया और सिर्फ़ वन्यजीव संरक्षण के बजाय इंसानी अधिकारों को ज़्यादा अहमियत दी. वह सरकारों के व्यावसायिक हितों के प्रति जुनून और किसानों और आदिवासी लोगों के अधिकारों की अनदेखी से बहुत परेशान थे.

असल में उन्होंने 1972 के वन्यजीव (सरंक्षण) अधिनियम को वन विभाग के हाथों में ‘भारत के आम लोगों को दबाने’ का एक हथियार मानना ​​शुरू कर दिया था, खासकर शिकार करने वाले समुदायों और किसानों को अपराधी बनाकर.


वन प्रबंधन में दिलचस्पी

प्रो. रामचंद्र गुहा लिखते हैं, जानवरों की पारिस्थितिकी पर अपने अध्ययन के दौरान माधव गाडगिल का सामना नेशनल पार्क के पास रहने वाले आदिवासियों और किसानों के बीच चल रहे टकरावों से हुआ. इसी बीच उन्हें वन प्रबंधन में ज़्यादा दिलचस्पी हो गई और उन्हें यह देखकर दुख हुआ कि इस क्षेत्र में सरकारी नीतियां व्यावसायिक हितों के पक्ष में बहुत ज़्यादा झुकी हुई थीं और किसानों, चरवाहों और कारीगरों की ज़रूरतों को नज़रअंदाज़ कर रही थीं.

पश्चिमी घाट क्षेत्र का एक दृश्य. (फोटो साभार: S. Thangaraj Panner Selvam/whc.unesco.org)

वे लिखते हैं, माधव की सामाजिक चेतना बहुत विकसित थी, यह कुछ हद तक जन्मजात और कुछ हद तक विरासत में मिली थी (उनके पिता जाने-माने अर्थशास्त्री धनंजय गाडगिल थे, जो एक उदारवादी और मानवाधिकारों में गहरी दिलचस्पी रखते थे. साथ ही बीआर आंबेडकर के काम की तारीफ़ करते थे).

प्रो. रामचंद्र गुहा के अनुसार, माधव गाडगिल की आत्मकथा में दूसरी बातों के अलावा उनके द्वारा चेयर की गई विशेषज्ञों की एक समिति द्वारा लिखी गई पश्चिमी घाटों पर विस्तृत और दूरदर्शी रिपोर्ट के बारे में भी बताया गया है. इसमें नाजुक जंगलों और खड़ी पहाड़ियों का बारीकी और ध्यान से वर्णन किया गया था, जिन्हें खनन और दूसरी नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियों से ध्यान से बचाने की ज़रूरत थी और फैसले लेने में पंचायतों और स्थानीय समुदायों की ज़्यादा भागीदारी की वकालत की गई थी.

पश्चिमी घाट इकोलॉजी एक्सपर्ट पैनल

पश्चिमी घाट, जहां उनका जन्म हुआ था, उस पर उन्होंने खास ध्यान दिया. IISc से रिटायर होने के बाद सह्याद्री पहाड़ियों के आसपास पले-बढ़े व्यक्ति के तौर पर गाडगिल का पश्चिमी घाट का विशाल और गहरा अनुभव जन नीति को आकार देने में काम आया, जब उन्होंने 2010 में तत्कालीन UPA सरकार द्वारा गठित पश्चिमी घाट इकोलॉजी एक्सपर्ट पैनल (WGEEP) की अध्यक्षता की. बाद में इस पैनल को गाडगिल आयोग के नाम से जाना गया.

कांग्रेस नेतृत्व वाली तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार (Manmohan Singh Govt) ने विशेषज्ञों और स्थानीय लोगों द्वारा पश्चिमी घाट के नाज़ुक पारिस्थितिकी तंत्र और लोगों पर औद्योगीकरण, जलवायु परिवर्तन और व्यावसायिक लालच से हो रहे विनाश के बारे में दी गई चेतावनी पर ध्यान देते हुए गाडगिल को यह सलाह देने का काम सौंपा था कि घाटों को पारिस्थितिकी आपदा (Ecological Disaster) से कैसे बचाया जाए.

घाटों की सुरक्षा के लिए सख्त

ज़मीनी स्तर के आदमी होने के नाते गाडगिल ने उस इलाके का दौरा किया, जिसे वे बहुत अच्छे से जानते थे. जंगल और गांव दोनों जगहों के समुदायों, पंचायतों और वन अधिकारियों से बातचीत की और घाटों की सुरक्षा के लिए सख्त लेकिन लोगों द्वारा चलाई जाने वाली सुरक्षा की सिफारिश की.

पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी प्राधिकरण बनाने की वकालत करते हुए उन्होंने इसके ज़्यादातर हिस्से को पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील घोषित करने की मांग की. जिन क्षेत्रों को खास तौर पर खतरे में बताया गया था, उनमें कोई भी नया प्रदूषण फैलाने वाला उद्योग नहीं लगाए जाने और मौजूदा उद्योगों को धीरे-धीरे बंद किए जाने की सिफारिश की गई थी.


पारिस्थितिकीय रूप से संवेदनशील क्षेत्र

गाडगिल आयोग ने सिफारिश की कि पूरे पश्चिमी घाट को उनकी संवेदनशीलता के आधार पर अलग-अलग कैटेगरी में पारिस्थितिकीय रूप से संवेदनशील (Ecologically Sensitive) घोषित किया जाए. संक्षेप में इसमें 1,27,000 वर्ग किमी क्षेत्र को पारिस्थितिकीय रूप से संवेदनशील क्षेत्र के रूप में चिह्नित करने की बात कही गई थी.

हालांकि इससे एक राजनीतिक बवाल मच गया, क्योंकि पश्चिमी घाट क्षेत्र में आने वाले बड़े राज्यों – महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल – ने इसे लागू करने का विरोध किया. केरल में सबसे ज़्यादा विरोध प्रदर्शन हुए, जहां स्थानीय समुदायों और नेताओं ने रिपोर्ट की सिफारिशों में बताए गए सख्त प्रतिबंधों की वजह से आजीविका छिन जाने का डर जताया.


रिपोर्ट को नज़रअंदाज़ किया

विडंबना यह है कि गाडगिल ने 2011 की रिपोर्ट में पारिस्थितिकी सुरक्षा का एक भागीदारी वाला तरीका बताया था, लेकिन UPA सरकार ने इसे पब्लिक डोमेन से दूर रखा. 2012 में अदालत के आदेश के बाद जब रिपोर्ट सार्वजनिक की गई, तो उसे प्रभावी ढंग से नज़रअंदाज़ कर दिया गया.

उनकी सिफारिशों के विरोध के कारण जैसा कि उम्मीद थी, एक और पैनल बनाया गया. जाने-माने अंतरिक्ष वैज्ञानिक के. कस्तूरीरंगन (K. Kasturirangan) को इसका अध्यक्ष बनाया गया. इस पैनल ने 2013 में सिफारिश की कि एक छोटा इलाका (घाटों का 37%) सुरक्षित किया जाए, लेकिन उसे भी स्वीकार नहीं किया गया.

टकराव का क्षेत्र

कस्तूरीरंगन पैनल का काम 2022 में एक सरकारी अधिसूचना के मसौदे का आधार बनता है, जिसमें लगभग 57,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को पारिस्थितिकीय रूप से संवेदनशील क्षेत्र के रूप में सुरक्षित रखने की बात कही गई है. अंतिम अधिसूचना अभी लंबित है और एक विशेषज्ञ समिति कस्तूरीरंगन रिपोर्ट की सिफारिशों की जांच कर रही है.

इसके बाद आज तक पश्चिमी घाट विकास की सोच और संरक्षण की मांगों के बीच टकराव का क्षेत्र बना हुआ है.

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