Manipur Ethnic Violence: विस्थापित मेईतेई समुदाय का दिल्ली में धरना, कहा- सरकार ने पर्याप्त कदम नहीं उठाए

दिल्ली के जंतर मंतर पर मेईतेई समुदाय का प्रदर्शन. (फोटो साभार: फेसबुक वीडियोग्रैब)

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Manipur Ethnic Violence: दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरने पर बैठे मेइतेई समुदाय के सदस्यों ने आरोप लगाया कि जातीय हिंसा शुरू हुए दो साल से ज़्यादा का समय बीत गया है, लेकिन सरकार ने यह सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए हैं कि सभी विस्थापित लोग मणिपुर में अपने घरों को लौट सकें.

उन्होंने विस्थापित लोगों की सुरक्षित और सम्मानजनक घर वापसी की मांग की, ताकि वे अपना जीवन फिर से शुरू कर सकें.

सब कुछ पीछे छूट गया

एक युवती ने बताया कि उसका घर चुराचांदपुर में था और वह हिंसा में बर्बाद हो गया, उसने हिंसा शुरू होने और घर छोड़कर भागने का अपना अनुभव बताया.

उन्होंने कहा, ‘हम सब कुछ पीछे छोड़कर आ गए. मैं एयरलाइन केबिन क्रू के तौर पर ट्रेनिंग लेने की कोशिश कर रही हूं. मैंने पासपोर्ट के लिए अप्लाई किया, लेकिन चुराचांदपुर पुलिस लंबे समय से वेरिफिकेशन करने से मना कर रही है. उनका कहना है कि ‘संबंधित व्यक्ति का घर दिए गए पते पर नहीं है’.’

एनडीटीवी की रिपोर्ट के अनुसार, युवती ने कहा, ‘सब जानते हैं कि हमारे घर जला दिए गए हैं और हम वापस नहीं जा पाए हैं. कोई हमारी मदद नहीं कर रहा है. हम और कुछ नहीं मांग रहे हैं. हम बस अपना हक वापस चाहते हैं – हमारा घर, हमारी ज़मीन, हमारी खुशी और हमारी यादें.’

चीफ जस्टिस से संज्ञान लेने की अपील

उस युवती ने भारत के चीफ जस्टिस (सीजेआई) सूर्यकांत से अपील की कि हज़ारों सुरक्षाकर्मियों की तैनाती के बावजूद हथियारबंद समूहों द्वारा आतंरिक रूप से विस्थापित लोगों को वापस लौटने की इजाजत न दिए जाने के मुद्दे पर वह खुद संज्ञान लें.

आंतरिक रूप से विस्थापित लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाले मेईतेई संगठनों के एक समूह ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को एक ज्ञापन भी सौंपा है, जिसमें यह सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाने की मांग की गई कि समुदायों के बीच बातचीत शुरू हो, विस्थापित लोगों की सुरक्षित वापसी के लिए व्यवस्था की जाए और चूड़ाचांदपुर, मोरेह, कांगपोकपी और इंफाल पूर्व आदि में उनके नष्ट हुए घरों को एक तय समय सीमा के भीतर फिर से बनाया जाए.

मूल जमीन पर हो निर्माण

राष्ट्रपति को दिए गए ज्ञापन में कहा गया है, ‘जिन परिवारों के पास पट्टे वाली ज़मीन है, उन पर निर्माण उनके मूल ज़मीन पर ही होना चाहिए.’

राष्ट्रपति मुर्मू पिछले हफ्ते मणिपुर के दो दिवसीय दौरे पर थीं. उन्होंने मणिपुर के लोगों को याद दिलाया कि जिस ‘खूबसूरत ज़मीन’ को वे अपना घर कहते हैं, उसकी ताकत उसकी विविधता में है. उन्होंने संकेत दिया कि मणिपुर में पहाड़ी और घाटी के बीच का बंटवारा अच्छा नहीं होगा; इसके बजाय, उन्होंने कहा कि पहाड़ और घाटी हमेशा एक-दूसरे के पूरक रहे हैं.

न्यायिक दखल जरूरी

जंतर मंतर पर धरने पर बैठे अन्य लोगों ने कहा कि हज़ारों विस्थापित परिवारों में उम्मीद जगाने और उन्हें न्याय दिलाने के लिए तुरंत न्यायिक दखल ज़रूरी है. उन्होंने सभी संबंधित पक्षों से संवैधानिक गारंटी और मानवीय गरिमा की रक्षा के लिए तुरंत कार्रवाई करने को कहा.

मालूम हो कि हिंसाग्रस्त मणिपुर बीते फरवरी माह से राष्ट्रपति शासन के तहत है.

लगभग 50 हजार लोग विस्थापित

एनडीटीवी की रिपोर्ट के अनुसार, ​राष्ट्रपति मुर्मू ने अपनी यात्रा के दूसरे दिन इंफाल से 60 किलोमीटर दूर सेनापति जिले में एक कार्यक्रम में कहा था, ‘मणिपुर की ताकत उसकी विविधता, उसकी संस्कृति, भाषाओं और परंपराओं में है. पहाड़ियां और घाटी हमेशा एक-दूसरे के पूरक रहे हैं. एक ही खूबसूरत ज़मीन के दो हिस्सों की तरह, मैं सभी समुदायों से शांति, समझ और सुलह के प्रयासों का समर्थन जारी रखने का आग्रह करती हूं.’

मालूम हो ​कि मेईतेई और कुकी समुदायों के बीच मई 2023 में जातीय हिंसा ज़मीन के अधिकार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे कई मुद्दों पर शुरू हुई थी. इस हिंसा में 260 से ज़्यादा लोग मारे गए हैं और लगभग 50,000 लोग विस्थापित हुए हैं.

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