संसद में पेश की गई एक रिपोर्ट में कंट्रोलर एवं ऑडिटर जनरल (CAG) ने इमरजेंसी खरीद (EP) के तहत भारतीय सेना के 72% कॉन्ट्रैक्ट (खरीद के लिए किया जाने वाला समझौता या अनुबंध) में देरी को उजागर किया है.
CAG ने बताया है कि ये कॉन्ट्रैक्ट तय समय सीमा के अंदर पूरे नहीं किए गए और उसने भारतीय सेना द्वारा ऑपरेशनल ज़रूरतों को पूरा करने के लिए तय खरीद प्रक्रिया और नियमों से दी गई छूट से परे ‘विचलन’ (तय नियमों से हटना) को नियमित करने पर भी आपत्ति जताई है. कैग की ये रिपोर्ट बीते 18 दिसंबर को संसद में पेश की गई.
40,000 करोड़ रुपये आवंटित
मौजूदा वित्त वर्ष के लिए इमरजेंसी खरीद-6 (EP–6) के तहत रक्षा मंत्रालय ने Operation Sindoor के बाद क्षमता की कमियों को दूर करने और गोला-बारूद और स्पेयर पार्ट की भरपाई के लिए ज़रूरी उपकरण और तंत्र खरीदने के लिए लगभग 40,000 करोड़ रुपये आवंटित किए. इसी प्रकार EP–5 का मकसद आतंकवाद विरोधी ज़रूरतों को पूरा करना था, जबकि EP–1 से EP–4 को गलवान घटना के बाद महत्वपूर्ण रणनीतिक कमियों को भरने के लिए लागू किया गया था.
द हिंदू बिजनेसलाइन की रिपोर्ट के अनुसार, ये विचार CAG की 2025 की रिपोर्ट नंबर 28 में दिए गए थे, जो मार्च 2023 को खत्म हुए साल के लिए केंद्र सरकार (रक्षा सेवाएं – सेना) से संबंधित है. इस रिपोर्ट में रक्षा मंत्रालय से संबंधित ऑडिट के निष्कर्ष शामिल हैं, जिसमें रक्षा विभाग, सेना, मिलिट्री इंजीनियर सर्विसेज़, बॉर्डर रोड्स ऑर्गनाइज़ेशन (BRO) और रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) शामिल हैं.
इमरजेंसी खरीद को मंजूरी
रिपोर्ट के अनुसार, इमरजेंसी ऑपरेशनल ज़रूरतों को पूरा करने के लिए रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता वाली रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC) ने जुलाई 2020 में चीन के साथ गलवान घाटी (Galwan Valley) में हुई झड़प के बाद सीमित समय के लिए इमरजेंसी खरीद को मंज़ूरी दी. इसके तहत सर्विस हेडक्वार्टर को ज़्यादा अधिकार देकर रक्षा खरीद/अधिग्रहण प्रक्रिया (DPP/DAP) के तहत फास्ट ट्रैक प्रक्रिया (FTP) के प्रावधानों में अतिरिक्त छूट दी गई.
CAG ने कहा, ‘हालांकि इस विशेष छूट का मुख्य मकसद तेज़ी से खरीद सुनिश्चित करना था, लेकिन ऑडिट में जांचे गए 72 प्रतिशत कॉन्ट्रैक्ट में तय समय सीमा के अंदर सामान डिलीवर नहीं किया गया.’ इमरजेंसी खरीद के प्रावधानों के तहत खरीद एक साल के अंदर या जैसा कि निविदा में बताया गया है, पूरा किया जाना ज़रूरी है.
प्रावधानों से हटने का मामला
रिपोर्ट में कहा गया है कि ‘ऑडिट में रक्षा अधिग्रहण परिषद की शर्तों और रक्षा खरीद/अधिग्रहण प्रक्रिया के प्रावधानों से हटने के ऐसे मामले देखे गए जो दी गई छूट से ज़्यादा थे’ और ‘सिफारिश की गई कि इन विचलनों (तय नियमों से हटना) को सेना मुख्यालयों द्वारा नियमित किया जाना चाहिए.’
हिंदू बिजनेसलाइन ने बीते 3 जून को ऑपरेशन सिंदूर के बाद सेना द्वारा इमरजेंसी राजस्व खरीद पर एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी, जिसमें कहा गया था कि EP-4 के तहत 50 प्रतिशत खरीद सफल नहीं हो पाए, जिसका मुख्य कारण यह था कि स्वदेशी कंपनियां तय समय सीमा के अंदर अच्छी गुणवत्ता के मिलिट्री सामान डिलीवर नहीं कर पाईं.
सामान बनाने में असमर्थता
अखबार की रिपोर्ट के अनुसार, फॉलो-अप के बाद, सेना बाकी 40 प्रतिशत प्रोजेक्ट्स को सुरक्षित करने में कामयाब रही, जबकि 10 प्रतिशत निर्माताओं या सप्लाई करने वालों पर जुर्माना लगाया गया.
CAG रिपोर्ट में यह भी पता चला कि हथियारों के स्पेयर पार्ट्स को देश में बनाने के मकसद से दिए गए 30 प्रतिशत ऑर्डर उन्हें सप्लाई करने वालों की साजोसामान विकसित करने में असमर्थता के कारण रद्द कर दिए गए. ये प्रोजेक्ट्स जनवरी 2010 में स्थापित डायरेक्टोरेट ऑफ इंडिजनाइजेशन (DoI) द्वारा शुरू किए गए थे, जिसने पांच सालों में 24.32 करोड़ रुपये का खर्च किया.
रिपोर्ट में कहा गया है, ‘स्वदेशीकरण प्रक्रिया के अलग-अलग चरणों में देरी हुई और स्वदेशी विकास के लिए दिए गए 30 प्रतिशत सप्लाई ऑर्डर रद्द कर दिए गए. इसके मुख्य कारणों में विक्रेता का जवाब न मिलना, सामान बनाने में असमर्थता और तय सामग्री का उपलब्ध न होना शामिल था.’




