‘दिल्ली में पेयजल की गुणवत्ता गंभीर संकट में’, CAG की ऑडिट रिपोर्ट पर JSA इंडिया ने जताई चिंता

(प्रतीकात्मक फोटो साभार: Pixabay)

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भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की हालिया ऑडिट रिपोर्ट, जिसे 7 जनवरी 2026 को दिल्ली विधानसभा में प्रस्तुत किया गया, ने दिल्ली जल बोर्ड (DJB) द्वारा आपूर्ति किए जा रहे पीने के पानी की गुणवत्ता और सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताएं उजागर की हैं. रिपोर्ट के निष्कर्ष दिल्ली एवं राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के निवासियों के स्वास्थ्य के संदर्भ में बड़े जोखिमों की ओर इशारा करते हैं.

गैर-सरकारी संगठन जन स्वास्थ्य अभियान इंडिया (JSA इंडिया/JSAI) ने इन तथ्यों पर चिंता जताते हुए एक बयान जारी किया है.

संगठन की ओर से जारी बयान में कहा गया है, ऑडिट रिपोर्ट में उल्लिखित सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि भूजल के आधे से अधिक नमूने पीने योग्य नहीं पाए गए. CAG के अनुसार, जांच किए गए 16,234 भूजल नमूनों में से 8,933 नमूने (लगभग 55 प्रतिशत) पेयजल मानकों पर खरे नहीं उतरे. ऑडिट अवधि के दौरान असफल नमूनों का अनुपात अलग-अलग वर्षों में 49 प्रतिशत से लेकर 63 प्रतिशत तक रहा.

जल गुणवत्ता परीक्षण की कमी

JSA इंडिया ने कहा, CAG रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि दिल्ली की अनुमानित कुल जल आवश्यकता 1,680 मिलियन यूनिट है, जबकि राज्य लगभग 25 प्रतिशत की लगातार कमी से जूझ रहा है. और भी गंभीर बात यह है कि जल गुणवत्ता परीक्षण अत्यंत अपर्याप्त होने के कारण आपूर्ति किए जा रहे पानी की गुणवत्ता बड़े पैमाने पर अज्ञात बनी हुई है.

दिल्ली जल बोर्ड की प्रयोगशालाओं में कर्मचारियों और उपकरणों की भारी कमी है. नतीजतन पानी की जांच BIS मानकों के अनुसार हो ही नहीं रही थी.

संगठन के अनुसार, CAG ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि ‘जिन क्षेत्रों में भूजल के नमूने पीने योग्य नहीं पाए गए, वहां से जलापूर्ति इस घटिया पानी का उपयोग करने के लिए जनता को मजबूर कर रहा है, जो कि उनके स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा है.’

बिना उपचारित पानी की आपूर्ति

ऑडिट में यह भी सामने आया है कि पांच वर्ष की ऑडिट अवधि के दौरान प्रतिदिन 80-90 मिलियन गैलन (MGD) कच्चा, बिना उपचारित पानी बोरवेल और रेनी वेल्स से सीधे भूमिगत जलाशयों में और कुछ मामलों में सीधे उपभोक्ताओं को आपूर्ति किया गया. बिना उपचारित पानी की यह सीधी आपूर्ति पेयजल सुरक्षा को गंभीर रूप से कमजोर करती है.

JSA इंडिया ने बयान में कहा, रिपोर्ट यह भी रेखांकित करती है कि जल गुणवत्ता निगरानी की व्यवस्था स्वयं ही कमजोर है, क्योंकि जल शोधन संयंत्रों, जलाशयों, जल आपात इकाइयों और बोरवेलों पर फ्लो मीटर स्थापित नहीं हैं. इसके कारण दिल्ली जल बोर्ड उपचारित, परिवाहित और आपूर्ति किए गए पानी की मात्रा और गुणवत्ता का सही आकलन नहीं कर पा रहा है. यह स्थिति जलजनित रोगों की रोकथाम से जुड़े सार्वजनिक स्वास्थ्य के बुनियादी सिद्धांतों का उल्लंघन है.

भारी धातुओं की मौजूदगी

CAG के अनुसार, दिल्ली जल बोर्ड की प्रयोगशालाएं कर्मचारियों और उपकरणों की कमी के साथ संचालित हो रही थीं और जल नमूनों की जांच केवल 12 मानकों पर की जा रही थी, जबकि BIS पेयजल मानक (BIS 10500:2012) के तहत 43 मानकों पर परीक्षण अनिवार्य है. आर्सेनिक और सीसा जैसी भारी धातुओं, विषैले पदार्थों, रेडियोधर्मी तत्वों, जैविक और विषाणुजन्य मानकों की जांच नहीं की गई.

संगठन ने कहा, रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि निजी तौर पर संचालित जल शोधन और पुनर्चक्रण संयंत्रों में प्रतिबंधित और कैंसरकारी पॉलीइलेक्ट्रोलाइट्स का उपयोग जारी रहा, जबकि इनके उपयोग पर स्पष्ट निर्देशों के तहत प्रतिबंध है.

CAG ने चेतावनी दी है कि पेयजल में रेडियोधर्मी पदार्थों और भारी धातुओं की मौजूदगी घातक हो सकती है, जिससे उपभोक्ताओं को महत्वपूर्ण अंगों के नुकसान समेत एनीमिया और कैंसर जैसी बीमारियां हो सकती हैं. इन परीक्षणों को न करना दिल्ली निवासियों के सामने गंभीर और दीर्घकालिक स्वास्थ्य जोखिम खड़ा करता है.


JSA इंडिया की मांगें

JSA इंडिया की ओर से इस मामले में जवाबदेही तय करने और त्वरित सुधारों की मांग की है. JSA इंडिया दिल्ली सरकार, दिल्ली जल बोर्ड और संबंधित नियामक प्राधिकरणों से निम्नलिखित कदम उठाने का आह्वान करता है:

1. बिना उपचारित भूजल की आपूर्ति तुरंत बंद की जाए.

2. BIS पेयजल मानकों का पूर्ण अनुपालन सुनिश्चित किया जाए.

3. जल परीक्षण प्रयोगशालाओं को आवश्यक उपकरणों से लैस करते हुए उन्नत किया जाए और पर्याप्त स्टाफ की नियुक्ति की जाए.

4. सभी स्वास्थ्य-संवेद शील मानकों पर व्यापक जल परीक्षण किया जाए.

5. जल गुणवत्ता की जांच हर 15 दिन में अनिवार्य रूप से की जाए.

6. सभी जल गुणवत्ता आंकड़ों को पारदर्शिता के साथ सार्वजनिक डोमेन में रखा जाए.

7. सार्वजनिक स्वास्थ्य की लंबे समय से उपेक्षा के लिए जवाबदेही तय की जाए.

8. सुरक्षित पेयजल तक पहुंच एक मौलिक अधिकार है. इसे सुनिश्चित करने में निरंतर संस्थागत विफलता सार्वजनिक विश्वास और सार्वजनिक स्वास्थ्य दायित्व का गंभीर उल्लंघन है.

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