दिल्ली की ज़हरीली हवा में ऐसे Superbugs भी हो सकते हैं, जिन पर एंटी-बायोटिक दवा असर नहीं करती: शोध

(प्रतीकात्मक फोटो साभार: Pixabay)

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क्या वायु प्रदूषण से जूझ रही राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की हवा में ऐसे बै​क्टीरिया या ‘सुपरबग’ भी मौजूद हैं, जो हमारे स्वास्थ्य को अपेक्षाकृत गंभीर रूप से नुकसान पहुंचा सकते हैं? क्या ये ऐसे ‘सुपरबग’ हैं, जिन पर एंटीबायोटिक दवाओं का भी असर नहीं होता? ये कुछ सवाल हैं, जो एक शोध के नतीजों को देखते हुए खराब वायु गुणवत्ता से संघर्ष कर रही दिल्ली और यहां के लोगों के सामने खड़े हो गए हैं.

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) के शोधकर्ताओं के एक नए अध्ययन से पता चलता है कि इस सर्दी के दिनों में दिल्ली शहर का जहरीला धुआं न केवल धूलकणों के प्रदूषण से भरा है, बल्कि यह बाहरी और अंदरूनी दोनों हवाओं (Outdoor and Indoor Air) में दवा प्रतिरोधी बैक्टीरिया या ‘सुपरबग’ भी ले जा सकता है.

Nature – Scientific Reports नाम की पत्रिका में प्रकाशित इस शोध में सर्दियों के कुछ नमूनों में वायुजनित बैक्टीरिया, विशेष रूप से स्टेफिलोकोसी (Staphylococci) का स्तर पाया गया, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की अनुशंसित जोखिम सीमा से 16 गुना से अधिक है.

दवाओं का असर नहीं

इनमें से कई बैक्टीरिया मेथिसिलिन-प्रतिरोधी और कई तरह की एंटीबायोटिक दवाओं के प्रतिरोधी थे, जिससे राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में प्रदूषित हवा में सांस लेने वाले लोगों में सांस और प्रणालीगत संक्रमण (Systemic Infections) का इलाज करना मुश्किल होने की संभावना के बारे में चिंता बढ़ गई थी.

बीते 7 जनवरी को एनडीटीवी की रिपोर्ट में बताया है कि यह खोज शीतकालीन स्मॉग (Winter Smog), पार्टिकुलेट मैटर (PM2.5 और PM10) में बढ़ोतरी के साथ दिल्ली के ऐतिहासिक संघर्ष की पृष्ठभूमि में आई है, जो न केवल अस्थमा और हृदय रोग को बढ़ाता है, बल्कि अब रोगाणुरोधी प्रतिरोध (AMR) के लिए एक वाहक के रूप में कार्य कर सकता है.

स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यह पहले से ही दुनिया के सबसे खराब वायु प्रदूषण से जूझ रहे दिल्ली लोगों के स्वास्थ्य पर खतरे के नया आयाम जोड़ता है.

§ अध्ययन में क्या पाया गया §

1. बैक्टीरिया सुरक्षित सीमा से ऊपर

JNU के इस अध्ययन ने दिल्ली के कई स्थानों पर इनडोर और आउटडोर शहरी वातावरण से हवा के नमूने एकत्र किए, जिनमें बाजार, आवासीय क्षेत्र और यहां तक कि एक सीवेज उपचार संयंत्र भी शामिल है.

सभी मौसमों में शोधकर्ताओं ने पाया कि स्टैफिलोकोकल बैक्टीरिया (Staphylococcal Bacteria) की सांद्रता WHO की सुरक्षा सीमा 1,000 कॉलोनी-फॉर्मिंग यूनिट (CFU) प्रति घन मीटर से कहीं अधिक है, जो सर्दियों में बढ़कर 16,000 CFU/m3 से अधिक हो जाती है.

इससे पता चलता है कि दिल्ली के वायुमंडल में इंसानों के लिए सुरक्षित माने जाने वाले माइक्रोबियल भार (सूक्ष्मजीवों जैसे बैक्टीरिया, फंगस, वायरस की कुल संख्या या कंसंट्रेशन) से कहीं अधिक मात्रा में सूक्ष्मजीव मौजूद हैं, खासकर सर्दियों के महीनों के दौरान होने वाली धुंध, प्रदूषकों और बायोएरोसोल (वायुजनित कण, जिनमें जीवित या मृत बैक्टीरिया, वायरस, कवक, पराग और कोशिका के टुकड़े शामिल होते हैं) को जमीनी स्तर के करीब फंसा लेती है.


2. दवा प्रतिरोध: एक गंभीर स्वास्थ्य चिंता

रिपोर्ट के अनुसार, अध्ययन का सबसे चिंताजनक पहलू बैक्टीरिया की एंटीबायोटिक दवाओं के खिलाफ प्रतिरोध की क्षमता थी. शोधकर्ताओं ने मेथिसिलिन-प्रतिरोधी स्टेफिलोकोसी (MRS) की पहचान की, जिनमें से कई ने Macrolides, Beta-Lactams और Gentamicin जैसे कई फ्रंटलाइन एंटीबायोटिक दवाओं के लिए मल्टीड्रग प्रतिरोध (MDR) दिखाया यानी इन दवाओं का उस पर कोई असर नहीं हुआ.

जीनोटाइपिक परीक्षणों (Genotypic Tests) ने MecA समेत एंटीबायोटिक प्रतिरोध जीन (ARGs) की उपस्थिति की पुष्टि की, जो मेथिसिलिन प्रतिरोध से जुड़ा हुआ है, जो इलाज में मुश्किल बैक्टीरिया की पहचान है.


ठंड में प्रदूषण का जोखिम

अध्ययन में कहा गया है कि दवा-प्रतिरोधी बैक्टीरिया का स्तर सर्दियों में चरम पर होता है, जो स्मॉग (वायु प्रदूषण की एक अवस्था) से संबंधित है. संभवत: इसमें कई पर्यावरणीय कारक योगदान देते हैं. जैसे-

1. सर्दियों के दौरान हवा का खराब फैलाव प्रदूषकों और रोगाणुओं को जमीन के पास फंसा देता है.

2. प्रदूषित हवा में मौजूद उच्च पार्टिकुलेट मैटर (High Particulate Matter) ऐसी सतहें प्रदान करते हैं, जिन पर बैक्टीरिया चिपक सकते हैं, जिससे उनके अस्तित्व और परिवहन में सहायता मिलती है.

3. कम आर्द्रता और ठंडे तापमान से कुछ रोगाणुओं को वायुजनित रूप में लंबे समय तक बने रहने में मदद मिलती है.

इसके उलट, ऐसा प्रतीत होता है कि मानसून की बारिश बाहरी बैक्टीरिया प्रदूषकों को धो देती है, जिससे गीले मौसम के दौरान वायुजनित भार काफी कम पाया गया.

सुपरबग्स का स्वास्थ्य पर असर

रिपोर्ट के अनुसार, इस तरह के बैक्टीरिया,​ जिन पर एंटीबायोटिक दवाओं का भी असर नहीं होता, के सांस के रास्ते शरीर के अंदर जाने से तुरंत इन्फेक्शन नहीं होता, लेकिन इससे इन्फेक्शन होने का खतरा बढ़ जाता है, जिसका इलाज मुश्किल हो सकता है, खासकर अगर बैक्टीरिया सांस की नली या घावों के ज़रिये शरीर में घुसते हैं.


जिन लोगों को इनसे सबसे ज़्यादा खतरा है, उनमें ये लोग शामिल हैं:

1. बच्चे और शिशु जिनकी प्रतिरोधक क्षमता अभी विकसित हो रही है.

2. कमज़ोर प्रतिरोधक क्षमता (Weaker Immune Systems) वाले बुज़ुर्ग और अन्य लोग.

3. अस्थमा या COPD जैसी पुरानी फेफड़ों की बीमारियों वाले लोग.

4. खुले घाव या हाल ही में सर्जरी कराने वाले लोग.


ऐसे बैक्टीरिया के संपर्क में आने से इन लोगों को गंभीर इन्फेक्शन हो सकता है, जिन पर स्टैंडर्ड एंटीबायोटिक थेरेपी का असर कम होता है, जिससे इलाज मुश्किल हो जाता है और अस्पताल में भर्ती करने की संभावना बढ़ जाती है.

शोधकर्ताओं की सलाह

1. एंटीबायोटिक-रेसिस्टेंट बैक्टीरिया की व्यवस्थित पर्यावरण निगरानी हो.

2. हवा के गुणवत्ता आंकड़ों में रोगाणुरोधी प्रतिरोध (AMR) सर्विलांस को शामिल किया जाए.

3. एक ऐसी स्वास्थ्य रणनीति बनाई जाए जो प्रदूषण, एंटीबायोटिक के गलत इस्तेमाल और कचरा प्रबंधन के समाधान की दिशा में काम करे.

रिपोर्ट के अनुसार, JNU के इस अध्ययन के नतीजे एक बड़ी चेतावनी हैं. इससे पता चलता है कि दिल्ली की सर्दियों की ज़हरीली हवा में न सिर्फ़ ऐसे कण हैं, जो दिल और फेफड़ों को नुकसान पहुंचाते हैं, बल्कि इसमें दवा-प्रतिरोधी बैक्टीरिया भी हो सकते हैं, जो इन्फेक्शन को और खतरनाक बना सकते हैं और एंटीबायोटिक दवाओं के साथ दिए जा रहे इलाज को बेअसर कर सकते हैं.

जैसे-जैसे हर साल लाखों लोगों पर वायु प्रदूषण का असर पड़ रहा है, इस नए सामने आए बैक्टीरिया आधारित जोखिम को समझना और उसे कम करना शहर की सार्वजनिक स्वास्थ्य रणनीति का हिस्सा बनना चाहिए.

दुनिया की सबसे प्रदूषित राजधानियों में से एक (दिल्ली) में स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए पूरी निगरानी, ​​साफ़ हवा की पहल और एंटीबायोटिक दवाओं का सही इस्तेमाल बहुत ज़रूरी है.

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