पिछले पांच सालों में विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में जाति के आधार पर भेदभाव की शिकायतों में 118.4% की बढ़ोतरी हुई है, जो 2019-20 में 173 से बढ़कर 2023-24 में 378 हो गई हैं और इन मामलों में समाधान दर लगभग 90% है. यह जानकारी विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा साल 2025 में एक संसदीय समिति और सुप्रीम कोर्ट को दिए गए आंकड़ों में सामने आई है.
2019-20 और 2023-24 के बीच UGC को 704 विश्वविद्यालयों और 1,553 कॉलेजों के समान अवसर प्रकोष्ठ (EOCS/Equal Opportunity Cells) और अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति प्रकोष्ठ (SC/ST Cells) से जातिगत भेदभाव की 1,160 शिकायतें मिलीं. इनमें से 1,052 शिकायतों को सुलझा लिया गया, जो 90.68% की निपटान दर है. हालांकि, इस दौरान लंबित मामलों की संख्या बढ़ गई, जो 2019-20 में 18 से बढ़कर 2023-24 में 108 हो गई.
2023-24 में 378 मामले
हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, मार्च 2025 में UGC द्वारा शिक्षा, महिला, बाल, युवा और खेल पर संसदीय स्थायी समिति (Parliamentary Standing Committee) के साथ साझा किए गए आंकड़ों से पता चला कि 2019-20 में विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में जातिगत भेदभाव के 173 मामले सामने आए, जो 2020-21 में बढ़कर 182 और 2021-22 में 186 हो गए. यह संख्या 2022-23 में 241 और 2023-24 में 378 तक पहुंच गई.
संसदीय समिति ने छात्रों पर भेदभाव के मनोवैज्ञानिक प्रभाव को कम करने के लिए प्रशिक्षित मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों के साथ कैंपस में काउंसलिंग सेंटर, 24/7 हेल्पलाइन और ऑनलाइन काउंसलिंग सेवाओं की स्थापना की सिफारिश की.
नाम न बताने की शर्त पर UGC के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, ‘SC/ST और समान अवसर प्रकोष्ठ के काम करने के तरीके के बारे में छात्रों में जागरूकता बढ़ने के कारण मामलों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है. ये प्रकोष्ठ शिकायतों के प्रति जवाबदेह हैं और सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं, इसलिए मामले सुलझाए जा रहे हैं.’
प्रशासनिक नियंत्रण में काम
हिंदुस्तान टाइम्स से बातचीत में दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एन. सुकुमार ने कहा कि 90% मामलों के समाधान की दर गुमराह करने वाली है. उन्होंने कहा, ‘ज़्यादातर SC/ST प्रकोष्ठ प्रशासनिक नियंत्रण में काम करते हैं. वे स्वायत्त दिखते हैं, लेकिन उनमें फैसले लेने की शक्ति नहीं होती है. इसके सदस्य प्रशासन द्वारा नामित किए हैं, जो विशेष रूप से गंभीर मामलों में निष्पक्षता को सीमित करता है.’
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) के फैकल्टी सदस्य और इसके SC/ST प्रकोष्ठ के पूर्व सदस्य डीके लोबियाल ने भी इसी तरह की चिंताएं जताईं. उन्होंने कहा, ‘पहले इन प्रकोष्ठ को कुछ हद तक आज़ादी थी, लेकिन समय के साथ वह आज़ादी खत्म हो गई है. आज, ज़्यादातर सदस्यों और सलाहकारों को प्रशासन द्वारा नियुक्त किया जाता है.’
UGC के पूर्व प्रमुख सुखदेव थोराट ने कहा कि समान अवसर प्रकोष्ठ UGC के ‘उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने संबंधी नियम, 2012’ के तहत बनाए गए थे, जबकि SC/ST प्रकोष्ठ इन नियमों से पहले के हैं और मूल रूप से फैकल्टी और स्टाफ की सेवा और रोज़गार से जुड़े मामलों से निपटने के लिए बनाए गए थे.
कमज़ोर जवाबदेही
थोराट ने कहा, ‘समस्या तब आती है, जब संस्थान इस अंतर को खत्म कर देते हैं और सभी शिकायतों को आंतरिक तरीकों से निपटाते हैं.’ उन्होंने आगे कहा कि इस तरह की गड़बड़ी जवाबदेही को कमज़ोर करती है और विश्वविद्यालयों को वैधानिक आयोग और अदालतों की जांच से बचने का मौका देती हैं.
रिपोर्ट के अनुसार, कैंपस में जातिगत भेदभाव का मुद्दा साल 2016 में तब सुर्खियों में आया, जब हैदराबाद विश्वविद्यालय में PhD स्कॉलर रोहित वेमुला की आत्महत्या (Rohit Vemula Suicide Case) के बाद देशभर में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए थे.
यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंचा है. 3 जनवरी 2025 को शीर्ष अदालत ने UGC को अपने 2012 के नियमों के तहत जातिगत भेदभाव की शिकायतों पर आंकड़ा इकट्ठा करने का निर्देश दिया. 27 फरवरी 2025 को दायर एक हलफनामे में UGC ने कहा कि उसे 3,522 उच्च शिक्षा संस्थानों से जवाब मिले हैं, जिनमें केंद्रीय, राज्य, निजी, डीम्ड और संबद्ध कॉलेज शामिल हैं.
समावेश को बढ़ावा
हलफनामे के अनुसार, 3,067 समान अवसर प्रकोष्ठ और 3,273 SC/ST प्रकोष्ठ स्थापित किए गए हैं, जिन्हें मिलाकर 1503 शिकायतें मिलीं, जिनमें से 1,426 का समाधान किया गया.
UGC ने 13 जनवरी को एक नोटिफिकेशन जारी कर सभी संस्थानों को भेदभाव की शिकायतों को संभालने और समावेश को बढ़ावा देने के लिए निष्पक्ष समितियां और समान अवसर केंद्र स्थापित करने का निर्देश दिया.
इसके साथ ही संस्थानों को 24 घंटे चलने वाली हेल्पलाइन भी चलानी होगी और एक ऑनलाइन सिस्टम बनाए रखना होगा. इस बारे में हाशिये के समुदायों के छात्रों ने कहा कि कमजोर शिकायत निवारण सिस्टम के गंभीर परिणाम होते हैं.




