Mid-Day Meal Cooks Protest: छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में हज़ारों की संख्या में मिड-डे मील बनाने वाले रसोइए प्रदर्शन कर रहे हैं. मांग है कि उनकी रोज़ाना की मज़दूरी 66 रुपये से बढ़ाकर 400 रुपये से ज़्यादा की जाए.
विरोध करने वालों में लगभग 95 प्रतिशत महिलाएं हैं, जिनमें से कई ग्रामीण और आदिवासी इलाकों की हैं. उनका कहना है कि उनकी मेहनत से कक्षाएं चलती हैं, जबकि उनके अपने घर मुश्किल हालात में हैं.
ये रसोइया, जो सरकार की एक महत्वाकांक्षी पोषण योजना के पीछे मुख्य वर्कफोर्स हैं, ‘छत्तीसगढ़ स्कूल मध्याह्न भोजन रसोइया संयुक्त संघ’ के बैनर तले 20 से अधिक दिनों से रायपुर में आंदोलन कर रहे हैं.
ज़िंदगी से खिलवाड़
आंदोलन में शामिल सविता मानिकपुरी (38 वर्ष) ने सवाल किया, ‘सरकार हमारी ज़िंदगी के साथ खिलवाड़ क्यों कर रही है?’ सविता इस आंदोलन में शामिल होने के लिए कांकेर ज़िले से आई थीं.
दूधावा गांव के एक सरकारी मिडिल स्कूल में 2011 से रसोइए का काम करने वाली मानिकपुरी ने बताया कि उन्हें शुरू में हर महीने 1,000 रुपये मिलते थे, जिसे पिछली कांग्रेस सरकार के दौरान बढ़ाकर 2,000 रुपये कर दिया गया था.
बीते सोमवार (19 जनवरी) को प्रदर्शन के दौरान समाचार एजेंसी पीटीआई से बातचीत में उन्होंने सवाल उठाया, ‘सरकारें बदलती हैं, लेकिन हमारी हालत नहीं बदलती. हम रोज़ 66 रुपये में कैसे गुज़ारा करें?’
29 दिसंबर 2025 से दे रहे धरना
उन्होंने कहा, ‘मेरे दो बच्चे हैं. मेरी बेटी ने स्कूल पूरा कर लिया है, लेकिन मैं उसे कॉलेज भेजने का खर्च नहीं उठा सकती. मेरा बेटा कक्षा 11 में है. उनके सपने हैं. मुझे नहीं पता कि उन्हें कैसे पूरा करूं.’
विरोध करने वाले संगठन के सचिव मेघराज बघेल (45 वर्ष) ने कहा कि राज्य में मिड-डे मील योजना के तहत करीब 87,000 रसोइए काम करते हैं. 29 दिसंबर 2025 से वे अनिश्चितकालीन हड़ताल पर हैं, जिससे कई स्कूलों में खाने की सेवाओं में रुकावट आई है.
रिपोर्ट के अनुसार, अलग-अलग जिलों से रसोइयों के समूह में आते हैं, कुछ दिनों तक रायपुर में हो रहे प्रदर्शन में शामिल होते हैं, और फिर घर लौट जाते हैं, फिर उनकी जगह दूसरे लोग आ जाते हैं. बघेल ने दावा किया कि किसी भी दिन 6,000 से 7,000 रसोइए विरोध प्रदर्शन में बैठते हैं.
440 रुपये भुगतान की मांग
उन्होंने कहा कि वह अक्टूबर 1995 में इस योजना के शुरू होने के बाद से ही इससे जुड़े हुए हैं. उन्होंने कहा, ‘हमने 15 रुपये प्रतिदिन से शुरुआत की थी. 30 साल बाद भी हम 66 रुपये पर ही हैं. हमारी मांग सीधी है – हमें कलेक्टर रेट यानी लगभग 440 रुपये प्रतिदिन का भुगतान किया जाए.’
बघेल ने दावा किया कि छत्तीसगढ़ सरकार ने रसोइयों के लिए कुछ नहीं किया है. उन्हें महीने में सिर्फ़ 2,000 रुपये मिलते हैं, वह भी साल में सिर्फ 10 महीने के लिए. उन्होंने कहा कि इसके उलट दूसरे राज्यों में इसी काम के लिए रसोइयों को काफी ज़्यादा सैलरी मिलती है – पुदुचेरी में 21,000 रुपये/महीना, केरल में 12,000 रुपये, लक्षद्वीप में 6,000 रुपये, मध्य प्रदेश और हरियाणा में 4,000 रुपये प्रति महीना.
गुज़ारा करना मुश्किल
बघेल ने कहा कि बढ़ती महंगाई को देखते हुए उनके लिए गुज़ारा करना मुश्किल होता जा रहा है. वेतन के अलावा रसोइयों की नौकरी भी पक्की नहीं है.
उन्होंने कहा, ‘जब स्कूल मर्ज हो जाते हैं या छात्रों की संख्या कम हो जाती है, तो अक्सर रसोइयों को हटा दिया जाता है. हमने अपनी पूरी ज़िंदगी इसी काम को करते हुए गुजारा है. अगर कोई स्कूल बंद हो जाता है, तो हम कहां जाएंगे?’ बघेल ने मांग की कि उन्हें सरकारी सिस्टम में कोई और नौकरी दी जाए।
धमतरी ज़िले के मथुरडीह गांव की भुवनेश्वरी मरकाम (40 वर्ष) पिछले 15 सालों से मिड-डे मील बना रही हैं. उन्होंने दुख जताते हुए कहा, ‘हम सुबह 9 बजे काम के लिए स्कूल पहुंचते हैं और दोपहर 3 बजे के बाद निकलते हैं. खाना बनाना, खाना परोसना, बर्तन धोना – इसमें पांच से छह घंटे लगते हैं. फिर भी सरकार कहती है कि हम सिर्फ दो घंटे काम करते हैं.’
स्वास्थ्य संबंधी दिक्कत
मरकाम का परिवार उनकी आमदनी और उनके मज़दूर पति की रोज़ की मज़दूरी पर निर्भर है. उन्होंने कहा, ‘हमारे पास खेती की ज़मीन नहीं है. यही हमारी आय का मुख्य ज़रिया है. हम दूसरे लोगों के बच्चों को खाना खिलाते हैं, लेकिन हम अपने बच्चों को ठीक से खाना नहीं खिला पाते. पढ़ाई, कपड़े, यहां तक कि बुनियादी ज़रूरतें भी पूरी करना मुश्किल है.’
विरोध प्रदर्शन वाली जगह पर कई महिलाओं ने धुएं की वजह से होने वाली लंबे समय की स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतों के बारे में भी बताया, क्योंकि गांवों में खाना पकाने के गैस सिलेंडर न मिलने की वजह से अक्सर लकड़ी के चूल्हे पर खाना बनाया जाता है. महिलाओं ने कहा कि जब तक सरकार उनकी मांगें नहीं मान लेती, तब तक वे विरोध प्रदर्शन जारी रखेंगी.
बंधुआ मजदूरों जैसा व्यवहार
छत्तीसगढ़ स्कूल मध्याह्न भोजन रसोइया संयुक्त संघ के मीडिया इंचार्ज प्रमोद राय बेमेतरा जिले के नवागांव गांव के एक स्कूल में रसोइए का काम करते हैं. उन्होंने खाना बनाने वालों को होने वाली स्वास्थ्य समस्याओं पर बात की, खासकर ग्रामीण इलाकों में जहां खाना पकाने की गैस न होने की वजह से अभी भी लकड़ी के चूल्हे पर खाना बनाया जाता है.
उन्होंने दावा किया, ‘कई लोगों को आंखों की समस्या और सांस की बीमारियां होती हैं. मेरी मां, जो पहले मिड-डे मील के रसोइए का काम करती थीं, उन्हें दिल से जुड़ी बीमारी है और वह 6-7 साल से इलाज करवा रही हैं. बारिश के मौसम में काम करने की स्थिति और खराब हो जाती है. इतने सालों की सेवा के बाद भी हमारे साथ बंधुआ मजदूरों जैसा व्यवहार किया जाता है.’
रिपोर्ट के अनुसार, इस बारे में टिप्पणी के लिए बार-बार कोशिशों के बावजूद राज्य शिक्षा विभाग के अधिकारियों से संपर्क नहीं हो पाया. राज्य कांग्रेस प्रमुख दीपक बैज ने सोमवार को विरोध स्थल का दौरा किया और रसोइयों की मांगों को अपना समर्थन दिया.




