शीर्ष अदालत का केंद्र सरकार को निर्देश- मानसिक रूप से बीमार बेघर लोगों का जल्द से जल्द पुनर्वास करें

(फोटो साभार: X)

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सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई करते हुए मानसिक बीमारियों से पीड़ित बेघर लोगों को ‘बेहद बेसहारा’ और ‘सबसे कमजोर’ बताया और केंद्र सरकार को उनके पुनर्वास के लिए मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) के साथ आने का आखिरी मौका दिया.

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने एक जनहित याचिका (PIL) की सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की, जब केंद्र सरकार की ओर से पेश वकील ने याचिका पर जवाब दाखिल करने के लिए कुछ समय मांगा.

शीर्ष अदालत ने मामले की अगली सुनवाई की तारीख 9 फरवरी 2025 तय की है.

संवेदनशील मुद्दा

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, सोमवार (19 जनवरी) को मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता नचिकेत जोशी से कहा, ‘हम आपको मानक संचालन प्रक्रिया तैयार करने और जवाब दाखिल करने का आखिरी मौका दे रहे हैं. यह एक संवेदनशील मुद्दा है और सब कुछ मानक संचालन प्रक्रिया के प्रभावी कार्यान्वयन पर निर्भर करता है. ये वे लोग हैं, जो अत्यधिक निराश्रित और सर्वाधिक असुरक्षित हैं. कृपया सुनवाई की अगली तारीख पर प्रक्रिया का मसौदा दाखिल करें.’

वकील ने पीठ को सूचित किया कि अतिरिक्त सॉलिसीटर जनरल बृजेंद्र चाहर इस मामले में पेश हो रहे थे, लेकिन वह अस्वस्थ थे और जवाब दाखिल नहीं कर सके.

मनोसामाजिक विकलांगता

वकील गौरव बंसल, जो इस मामले में याचिकाकर्ता भी हैं, ने अदालत को बताया कि यह तीसरी बार है कि केंद्र सरकार उस जनहित याचिका पर जवाब दाखिल करने में विफल रही है, जिसमें मनोसामाजिक विकलांगता (Psychosocial Disabilities) से पीड़ित बेघर लोगों के लिए एक नीति बनाने और लागू करने के लिए निर्देश देने की मांग की गई है.

बंसल ने कहा, ‘यह मुद्दा उन बेघर लोगों से संबंधित है, जो मानसिक रूप से बीमार हैं और भोजन के लिए सड़कों और सार्वजनिक स्थानों पर घूमते हैं. उन्हें पुनर्वास की ज़रूरत है.’

केंद्र सरकार द्वारा 19 दिसंबर 2025 को अदालत को सूचित किया गया था कि इन लोगों के पुनर्वास के लिए मसौदा SOP के दो सेट तैयार किए जा रहे हैं.

समर्थन की कमी

इससे पहले केंद्र सरकार ने कहा था कि अधिकारी पहले से ही इस मामले पर विचार-विमर्श कर रहे हैं और बैठकें आयोजित की जा रही हैं, तब शीर्ष अदालत ने केंद्र से इस मुद्दे को ‘बहुत गंभीरता से’ लेने के लिए कहा था.

मनोसामाजिक विकलांगता उन चुनौतियों को संदर्भित करती है, जिनका सामना मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं वाले लोगों को अन्य कारणों के अलावा भेदभाव और समर्थन की कमी के कारण करना पड़ता है.

सामाजिक अलगाव

याचिका में मनोसामाजिक विकलांगता से पीड़ित बेघर व्यक्तियों की मानवीय और प्रभावी हैंडलिंग सुनिश्चित करने के लिए कानून प्रवर्तन (पुलिस) और चिकित्सा स्वास्थ्य विभागों सहित प्रमुख हितधारकों के लिए SOP तैयार करने और कार्यान्वयन के लिए निर्देश देने की मांग की गई है.

इसमें ऐसे लोगों के सामने आने वाले मुद्दों पर प्रकाश डाला गया है, जिन्हें उचित देखभाल प्रदान किए जाने के बजाय, अक्सर उपेक्षा, सामाजिक अलगाव और शारीरिक और यौन शोषण का शिकार होना पड़ता है.

राष्ट्रीय नीति की कमी

याचिका में कहा गया है, ‘मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 और राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य नीति, 2014 सहित मौजूदा कानूनी और नीतिगत ढांचे के बावजूद उत्तरदाता (सरकार) मानसिक बीमारियों से पीड़ित बेघर व्यक्तियों की सुरक्षा और सहायता करने के प्रावधानों को लागू करने में विफल रहे हैं.’

याचिकाकर्ता ने कहा है कि बेघर होने और मानसिक बीमारियों को लेकर एक राष्ट्रीय नीति की कमी के परिणामस्वरूप ‘प्रणाली पूरी तरह से टूट गई है, जिससे हजारों व्यक्तियों को चिकित्सा देखभाल, आश्रय या सामाजिक अधिकारों तक पहुंच के बिना खुद की देखभाल करनी पड़ रही है’.

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