पिछले साल के बजट की तुलना में केंद्रीय बजट 2026 में देश के स्वास्थ्य बजट में 10% की बढ़ोतरी की गई. स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय को 1,06,530.42 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं. इससे सार्वजनिक स्वास्थ्य के प्रति नई प्रतिबद्धता का एहसास होता है.
हालांकि बार-बार नीतिगत आश्वासनों के बावजूद GDP के हिस्से के रूप में स्वास्थ्य पर सार्वजनिक खर्च लगभग 0.29% (2024-25 और 2025-26) से 0.31% (2023-24) पर स्थिर बना हुआ है. इस लगातार कम निवेश ने पूरे देश में सार्वजनिक स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे, मानव संसाधन और आवश्यक सेवाओं को कमजोर किया है.
लैप्स बजट
जन स्वास्थ्य अभियान भारत (JSA इंडिया) की ओर से जारी एक बयान में कहा गया है कि इससे भी ज्यादा चिंता की बात यह है कि काफी कम खर्च करने का लगातार चलन बना हुआ है, जैसा कि ‘लैप्स बजट’ शीर्षक वाली पंक्ति के आंकड़ों से देखा जा सकता है. पिछले पांच साल की अवधि (वित्त वर्ष 2019-20 से वित्त वर्ष 2023-24) में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने कुल 1,32,749 करोड़ रुपये सरेंडर (मतलब खर्च नहीं कर पाने की सूरत में रकम को लौटाना पड़ा) किए हैं.
संगठन के अनुसार, पिछले पांच सालों के बजट रुझानों की जांच करने पर पता चलता है कि वास्तविक स्वास्थ्य खर्च में लगातार गिरावट हो रही है, खासकर जब इसे महंगाई और बढ़ती स्वास्थ्य देखभाल जरूरतों के हिसाब से एडजस्ट किया जाता है.
बजटीय आवंटन का अध्ययन करते समय हमें संवैधानिक ऑडिट संस्था पिछले 5 सालों से केंद्र सरकार (वित्त खातों) पर अपनी ऑडिट रिपोर्ट में क्या बता रही है, इस पर भी ध्यान देना चाहिए. यह दुख की बात है कि बार-बार याद दिलाने के बावजूद लोक लेखा समिति और केंद्रीय वित्त मंत्रालय सही कदम उठाने और यथार्थवादी बजटीय योजना की ओर बढ़ने में विफल रहे हैं.

आवंटन से काफी कम खर्च
JSA इंडिया के अमूल्य निधि और गोरांगों मोहपात्रा ने कहा कि जब हम स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग के साथ-साथ स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग द्वारा मंज़ूर किए गए प्रावधानों के इस्तेमाल पर ऑडिट टिप्पणियों का अध्ययन करते हैं, तो हम पाते हैं कि एक भी ऐसा वित्तीय वर्ष नहीं था, जब इन दोनों विभागों ने आवंटन से काफी कम खर्च न किया हो. जबकि आवंटन पहले से कम स्तर पर हैं, इस तरह कम आवंटन में भी लगातार कम खर्च करना सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए जानलेवा साबित होता है.
इसके अलावा जब हम सार्वजनिक स्वास्थ्य पर आवंटन से ग्रांट के हिसाब से कम खर्च को देखते हैं, तो हमारे सामने यह तस्वीर आती है:

पारदर्शी तंत्र नहीं
संगठन की ओर से कहा गया, नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) की नवीनतम ऑडिट रिपोर्ट (रिपोर्ट संख्या 4, 2025) के अनुसार, बताए गए इरादे और राजकोषीय अभ्यास के बीच का अंतर और भी स्पष्ट हो जाता है. ऑडिट में स्वास्थ्य और शिक्षा उपकर संग्रह में महत्वपूर्ण वृद्धि पर प्रकाश डाला गया है, जो 2018-19 में 41,310 करोड़ रुपये से बढ़कर 2022-23 में 61,814 करोड़ रुपये हो गया. इसी अवधि के दौरान कुल उपकर और अधिभार संग्रह 2022-23 में तेजी से बढ़कर 4.81 लाख करोड़ रुपये हो गया.
हालांकि, ऑडिट यह स्पष्ट करता है कि स्वास्थ्य संबंधी उपकर स्वास्थ्य खर्च के लिए अलग से सुरक्षित नहीं रखे गए हैं. ये संग्रह भारत की संचित निधि में जमा किए जाते हैं और यह सुनिश्चित करने के लिए कोई पारदर्शी तंत्र नहीं है कि स्वास्थ्य के नाम पर एकत्र किए गए धन का उपयोग वास्तव में सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों को मजबूत करने के लिए किया जाए.
JSA इंडिया ने इन मुद्दों पर प्रकाश डाला
♦ सार्वजनिक स्वास्थ्य खर्च सकल घरेलू उत्पाद के 5% की प्रतिबद्धता से काफी कम है.
♦ स्वास्थ्य के लिए सुनिश्चित उपयोग के बिना स्वास्थ्य और शिक्षा उपकर संग्रह में वृद्धि.
♦ केंद्र सरकार द्वारा स्वास्थ्य संबंधी राजस्व कमाई पर पारदर्शिता और परिणाम-आधारित रिपोर्टिंग की कमी.
संगठन की प्रमुख मांगें
♦ CAG को बजट पर संसद सत्र के दौरान 2024-2025 के संबंध में प्रमुख वित्त खातों की चिंताओं को तत्काल जारी करना चाहिए.
♦ स्वास्थ्य उपकर को विशेष रूप से सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए अलग से सुरक्षित रखना चाहिए.
♦ नवीनतम CAG ऑडिट यह स्पष्ट करता है कि बजटीय घोषणाएं और स्वास्थ्य उपकर संग्रह सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा में वास्तविक, निरंतर निवेश का विकल्प नहीं हो सकते.
♦ सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करने के लिए राज्यों की वित्तीय क्षमता को मजबूत करना.
JSA इंडिया यह भी बताता है कि भारत के CAG को केंद्र सरकार के वित्त खातों का ऑडिट उचित समय के भीतर (यानी पिछले वित्तीय वर्ष की समाप्ति के 9 से 11 महीने के भीतर) अंतिम रूप देना चाहिए.




