झारखंड: 2018 और 2025 के बीच हिरासत में 400 से ज़्यादा मौतें, हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से मांगा स्पष्टीकरण

(प्रतीकात्मक फोटो साभार: Pixabay)

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Custodial Deaths in Jharkhand: झारखंड में साल 2018 और 2025 के बीच हिरासत में हुईं करीब 450 मौतों का हवाला देते हुए झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को एक हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है, जिसमें यह बताने के लिए कहा गया है कि क्या हर मामले में आपराधिक कानून के तहत ज़रूरी न्यायिक जांच की गई थी.

साल 2022 में दाखिल की गई एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश ​जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की पीठ ने कहा कि राज्य के गृह विभाग की ओर से दिया गया आंकड़ा, जो इस समय के दौरान पुलिस (Police Custody) और न्यायिक हिरासत (Judicial Custody) में लगभग 437 मौतों का है, उसमें यह साफ़ तौर पर नहीं बताया गया है कि क्या सभी मामलों में मजिस्ट्रेट जांच (Magistrate Inquiry) हुई थी.

सुरक्षा उपाय

द ​इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, अदालत ने CrPC के अनुच्छेद 176(1-A) का ज़िक्र किया, जिसमें यह ज़रूरी है कि अगर कोई व्यक्ति पुलिस या अदालत की मंज़ूरी वाली हिरासत में मर जाता है या गायब हो जाता है या फिर रेप का आरोप लगता है, तो सामान्य पुलिस जांच के अलावा एक न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा जांच ‘की जाएगी’.

पीठ ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के अनुच्छेद 196 के तहत प्रावधानों पर भी ध्यान दिया, जिसमें ऐसे ही सुरक्षा उपाय हैं.

यह पीआईएल साल 2022 में राज्य विधानसभा में उठाए गए एक सवाल के जवाबों को साथ में जोड़ने के बाद दायर की गई थी, जिसमें 2018 और 2022 के बीच 160 से ज़्यादा हिरासत में हुईं मौतें की जानकारी सामने आई थी. इसके बाद अदालत ने झारखंड सरकार को 2025 तक अपडेटेड और पूरा आंकड़ा देने का निर्देश दिया था.

नया हलफनामा दाखिल करे सरकार

अदालत ने गृह सचिव से एक नया हलफनामा दाखिल करने को कहा, जिसमें यह बताया गया हो कि कितने मामलों में न्यायिक जांच की गई और जहां ऐसी जांच नहीं हुई, उसका पूरा विवरण दिया जाए.

अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि हलफनामे में 2023 और 2025 के बीच रिपोर्ट की गईं मौतों के लिए BNSS के प्रावधानों के पालन को साफ किया जाए. यह भी पता लगाने को कहा गया है कि मौत की प्रकृति और कारण क्या था और क्या राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के दिशानिर्देशों का पालन पक्का किया गया था.

रिपोर्ट के अनुसार, अदातल ने कहा, ‘यह सब इसलिए ज़रूरी है, क्योंकि जो हलफनामा दाखिल किया गया है या उसके साथ जो चार्ट दिया गया है, उससे यह साफ नहीं है कि मौत का कारण पुलिस अधिकारियों ने खुद तय किया है या यह किसी न्यायिक जांच का नतीजा है, जैसा कि कानून के तहत विचार किया गया है. इसके अलावा मौतों की संख्या को देखते हुए यह देखना ज़रूरी है कि किसी गड़बड़ी को रोकने के लिए कानून के तहत दिए गए सुरक्षा उपायों का ठीक से पालन किया गया था या नहीं.’


नियम ठीक से लागू नहीं

याचिकाकर्ता की तरफ से पेश हुए एडवोकेट मोहम्मद शादाब अंसारी ने अदालत को बताया कि साफ कानूनी आदेश के बावजूद झारखंड में इतने सालों में इस नियम को ठीक से लागू नहीं किया गया है. उन्होंने कहा, ‘जब आंकड़ा रखा गया, तो पता चला कि यह संख्या बहुत ज़्यादा है, पूरे झारखंड में पुलिस और न्यायिक हिरासत में करीब 450 मौतें हुई हैं.’

अंसारी ने अदालत की बातों का ज़िक्र करते हुए कहा, ‘कार्यकारी (Police) खुद यह तय नहीं कर सकता कि मौत प्राकृतिक थी या नहीं. यह न्यायिक मजिस्ट्रेट को तय करना होगा.’

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि पुलिस हिरासत में हुईं मौतों की रिपोर्ट कम दिखाई जाती है. अंसारी ने आरोप लगाया, ‘पुलिस हिरासत के मामलों में संख्या कम दिखाई जाती है, क्योंकि अक्सर अधिकारी उनसे यह कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं कि व्यक्ति भाग गया और बाद में उसने खुद को फांसी लगा ली या कोई और बात बताते हैं, इसीलिए पुलिस हिरासत के आंकड़े कम लगते हैं.’


मजिस्ट्रेट जांच

राज्य सरकार की ओर से पेश वकील गौरव राज ने कहा कि अदालत यह जांच रहा है कि हिरासत में मौत के मामलों में, चाहे वे पुलिस हिरासत में हो या न्यायिक हिरासत में, मजिस्ट्रेट जांच की गई थी या नहीं.

उन्होंने कहा कि पिछली तारीखों पर अदालत ने खास तौर पर राज्य सरकार से यह बताने के लिए कहा था कि क्या हिरासत में मौत के हर मामले में मजिस्ट्रेट जांच की गई है और सरकार ने उसी हिसाब से विवरण दिया था. उन्होंने आगे कहा कि अदालत के सामने अभी का मुद्दा CrPC और BNSS के तहत ‘मजिस्ट्रेट’ के मतलब को साफ़ करने से जुड़ा है.

खास कैटेगरी तय नहीं

उनके अनुसार, प्रावधानों में ‘मजिस्ट्रेट’ का ज़िक्र है, लेकिन कोई खास कैटेगरी तय नहीं की गई है. अब सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ़ न्यायिक मजिस्ट्रेट के बारे में है या इसमें कार्यकारी मजिस्ट्रेट भी शामिल हो सकता है. उन्होंने कहा, ‘अदालत ने राज्य से अगली सुनवाई में एक और हलफनामें में इस बात को साफ करने को कहा है.’

झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य के गृह सचिव को 13 मार्च 2026 तक विस्तृत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है. मामले की अगली सुनवाई 19 मार्च को होनी है.

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