साल 2017 से सीवर और सेप्टिक टैंक में 622 सफाई कर्मचारियों की मौत; 52 परिवारों को नहीं मिला कोई मुआवज़ा

(प्रतीकात्मक फोटो साभार: यूट्यूब वीडियोग्रैब)

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Sanitation Workers Death in Sewers and Septic Tanks: साल 2017 से अब तक पूरे भारत में सीवर और सेप्टिक टैंक से जुड़ी घटनाओं में कम से कम 622 सफाई कर्मचारियों की मौत हो गई. चिंताजनक बात ये है कि प्रभावित परिवारों में से 52 परिवारों को कभी भी कोई मुआवज़ा नहीं मिला. छह मामलों को बिना किसी समाधान के बंद कर दिया गया.

बीते 17 मार्च को लोकसभा में ये आंकड़े सरकार की ओर से रखे गए हैं. ये आंकड़े समाजवादी पार्टी की सांसद इकरा चौधरी के एक सवाल के जवाब में सामने आए. उन्होंने सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय से सीवर में होने वाली मौतों और हाथ से मैला ढोने वालों के पुनर्वास के संबंध में यह सवाल पूछा था.


25 परिवारों को आंशिक मुआवज़ा

इस सवाल के लिखित जवाब में सामाजिक न्याय और अधिकारिता राज्य मंत्री रामदास अठावले ने लोकसभा में पेश किए गए आंकड़ों के माध्यम से बताया कि 21 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में रिपोर्ट की गईं 622 मौतों में से 539 परिवारों को पूरा मुआवज़ा मिला, 25 को आंशिक और 52 को कुछ भी नहीं मिला. छह मामले बंद कर दिए गए।

दि प्रिंट में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, सबसे ज़्यादा मौतें उत्तर प्रदेश में 86 दर्ज की गईं, जिसके बाद महाराष्ट्र में 82, तमिलनाडु में 77, हरियाणा में 76, गुजरात में 73 और दिल्ली में 62 मौतें हुईं.

क्या कहते हैं आंकड़े

मौतों की संख्या और मुआवज़ा पाने वाले परिवारों की संख्या के बीच का अंतर उत्तर प्रदेश में सबसे ज़्यादा था, जहां 86 में से 13 परिवारों को कोई आर्थिक मदद नहीं मिली और दो परिवारों को सिर्फ़ आंशिक भुगतान मिला.

दिल्ली में 62 में से 9 परिवारों को कुछ भी नहीं मिला. गुजरात में दो परिवारों को अभी तक मुआवज़ा नहीं मिला है और एक मामला बंद कर दिया गया. महाराष्ट्र में 9 परिवारों को बिना किसी भुगतान के छोड़ दिया गया.


उत्तर प्रदेश का हाल

उत्तर प्रदेश के भीतर ज़िला-स्तरीय आंकड़ों से पता चला कि चंदौली में ऐसी 4 मौतें दर्ज की गईं, लेकिन किसी को भी कोई मुआवज़ा नहीं दिया गया. अंबेडकर नगर में 2 मौतें रिपोर्ट की गईं और दोनों ही मामलों में कोई मुआवज़ा नहीं मिला. गौतम बुद्ध नगर में 16 मौतें हुईं. इनमें से 8 मामलों में पूरा मुआवज़ा मिला, 6 मामलों में कुछ भी नहीं मिला और दो मामले बंद कर दिए गए.

हालांकि इस बारे में कोई और जानकारी नहीं मिली कि किसी परिवार को मुआवज़े के तौर पर कितनी रकम मिली.

हाथ से मैला ढोना

अठावले ने बताया कि ‘हाथ से मैला उठाने वालों के नियोजन का प्रतिषेध और उनका पुनर्वास अधिनियम, 2013’ के तहत 2023 में किए गए एक सर्वे में पाया गया कि पूरे देश में किसी भी ज़िले में कोई भी व्यक्ति हाथ से मैला उठाने का काम नहीं कर रहा है.

हालांकि, 2013 और 2018 के दो पिछले सर्वे में 58,098 हाथ से मैला ढोने वाले लोगों (Manual Scavengers) की पहचान की गई थी, जिनमें से अकेले उत्तर प्रदेश में 32,473 लोग थे, जो कि राष्ट्रीय संख्या का आधे से भी ज़्यादा है।

इन सभी 58,098 लोगों और उनके आश्रितों को 40,000 रुपये की एकमुश्त नकद सहायता मिली. 27,928 लोगों को कौशल विकास प्रशिक्षण दिया गया. 2,679 लोगों को स्वरोज़गार के लिए 5 लाख रुपये तक की पूंजी सब्सिडी दी गई.

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