25 वर्ष से कम आयु के लगभग 40% स्नातक बेरोज़गार: अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की रिपोर्ट

(प्रतीकात्मक फोटो साभार: Meta AI)

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Unemployment in Indian Graduates: 15 से 25 वर्ष के आयु वर्ग में बेरोज़गारी दर लगभग 40% और 25 से 29 वर्ष के आयु वर्ग में 20% है; जबकि पिछले चार दशकों से भी अधिक समय से शैक्षणिक संस्थानों में एडमिशन लेने में तेज़ी से बढ़ोतरी हुई है. ये जानकारी हाल ही में अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी (Azim Premji University) की ओर से जारी एक रिपोर्ट में सामने आई है.

State of Working India 2026’ नाम की रिपोर्ट देश में शिक्षा (Education) और रोज़गार सृजन (Job Creation) के बीच बढ़ती खाई को उजागर करती है. भारत की युवा आबादी, जिसकी उम्र 15 से 29 वर्ष है, 36.7 करोड़ है, जो काम करने लायक आबादी का एक-तिहाई हिस्सा है. रिपोर्ट में बताया गया है कि इस समूह के 26.3 करोड़ लोग शिक्षा से बाहर हैं और संभावित कार्यबल का निर्माण करते हैं.


रोज़गार सृजन की गति

28 वर्ष की औसत आयु के साथ भारत दुनिया की सबसे युवा अर्थव्यवस्थाओं (Youngest Economies) में से एक है, लेकिन यह जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend) 2030 के बाद कम होना शुरू हो जाएगा, जिससे आने वाले दशक में रोज़गार सृजन की गति बेहद महत्वपूर्ण हो जाएगी.

द वायर में प्रकाशित इस रिपोर्ट के अनुसार, साल 2023 में 20 से 29 साल की उम्र के 6.3 करोड़ स्नातक युवाओं में से 1.1 करोड़ बेरोज़गार (Unemployed) थे. 15 से 25 साल के आयु वर्ग में बेरोज़गारी दर (Unemployment Rate) लगभग 40% है, और 25 से 29 साल के लोगों में यह 20% है. जहां 50% युवा पुरुष स्नातकों (Male Graduates) को बेरोज़गार होने की रिपोर्ट करने के एक साल के भीतर रोज़गार मिल जाता है, वहीं केवल 7% को ही स्थायी वेतन वाली नौकरी मिल पाती है.


बेरोज़गारी दर

इसके अलावा, रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि 1983 से अब तक स्नातक युवाओं में बेरोज़गारी दर में ज़्यादा बदलाव नहीं आया है और यह मोटे तौर पर 35% से 40% के बीच ही बनी हुई है. शिक्षा से रोज़गार की ओर बढ़ना एक गंभीर चुनौती बना हुआ है.

पिछले चार दशकों में शिक्षा के क्षेत्र में नामांकन (एडमिशन) में तेज़ी से बढ़ोतरी हुई है. युवा महिलाओं में नामांकन 1983 के 38% से बढ़कर 2023 में 68% हो गया, जबकि इसी अवधि में पुरुषों का नामांकन 49% से बढ़कर 73% हो गया.

2011 और 2023 के बीच अनुसूचित जाति (SC) का नामांकन 11% से बढ़कर 26% और अनुसूचित जनजाति (ST) का नामांकन 8% से बढ़कर 21% हो गया, हालांकि ये दोनों ही राष्ट्रीय औसत से नीचे बने हुए हैं.

पुरुषों ने पढ़ाई छोड़ी

हालांकि, रिपोर्ट में पुरुषों के नामांकन में हाल ही में आए एक बदलाव की बात कही गई है. शिक्षा के क्षेत्र में युवा पुरुषों की हिस्सेदारी 2017 में 38% से घटकर 2024 के आखिर में 34% रह गई. आंकड़ों से पता चलता है कि इनमें से 72% पुरुषों ने अपने घर की आमदनी में मदद करने की ज़रूरत के चलते पढ़ाई छोड़ दी.

शिक्षा के इस विस्तार की मुख्य वजह निजी संस्थानों (Private Institutions) की संख्या में हुई भारी बढ़ोतरी है. उदारीकरण (Liberalisation) के बाद से उच्च शिक्षा संस्थानों (Higher Education Institutions) की संख्या 1,644 से बढ़कर 69,534 हो गई है. कॉलेज घनत्व (College Density) यानी प्रति लाख युवाओं पर कॉलेजों की संख्या 2010 में 29 से बढ़कर 2021 में 45 हो गई.

हालांकि, रिपोर्ट में शिक्षकों की भारी कमी की ओर भी ध्यान दिलाया गया है: अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (AICTE) के मानकों के अनुसार, प्रति शिक्षक 15 से 20 छात्र होने चाहिए, लेकिन निजी कॉलेजों में औसतन 28 छात्र और सरकारी कॉलेजों में 47 छात्र हैं.

गुणवत्ता के पैमानों पर कमज़ोर

व्यावसायिक प्रशिक्षण (Vocational Training) में भी इसी तरह का रुझान देखने को मिला है. इंडस्ट्रियल ट्रेनिंग इंस्टिट्यूट (ITI) की संख्या में लगभग 300% की बढ़ोतरी हुई है. 2005 में इनकी संख्या 3,674 थी, जो 2025 तक बढ़कर 14,582 हो गई; इनमें से 80% संस्थान निजी क्षेत्र के हैं.

रिपोर्ट में यह बताया गया है कि यह विस्तार संस्थानों की गुणवत्ता की कीमत पर हुआ है; नए और निजी ITI गुणवत्ता के पैमानों पर कमज़ोर साबित हुए हैं और विनिर्माण क्षेत्र में रोज़गार के अवसरों से इनका जुड़ाव भी काफी कमज़ोर रहा है.

हालांकि उच्च शिक्षा का लोकतंत्रीकरण हुआ है. सबसे गरीब परिवारों से आने वाले छात्रों का हिस्सा 2007 में 8% से बढ़कर 2017 में 15% हो गया, फिर भी आर्थिक रुकावटें बनी हुई हैं.


व्यावसायिक कोर्स तक सीमित पहुंच

मेडिसिन की डिग्री की सालाना लागत लगभग 97,400 रुपये है और इंजीनियरिंग की डिग्री की लागत लगभग 23 लाख रुपये है. रिपोर्ट में कहा गया है कि ये लागतें अक्सर गरीब परिवारों के सालाना प्रति व्यक्ति खर्च से ज़्यादा होती हैं, जिससे व्यावसायिक पाठ्यक्रमों तक उनकी पहुंच सीमित हो जाती है और ज़्यादा वेतन वाली नौकरियों में असमानताएं और मज़बूत होती हैं.

जिन लोगों को डिग्री मिल जाती है, उन्हें वेतन में काफी ज़्यादा फ़ायदा मिलता है; शुरुआत में वे बिना डिग्री वालों के मुकाबले लगभग दोगुनी कमाई करते हैं और यह अंतर उनकी पूरी ज़िंदगी बढ़ता ही जाता है.


वेतन में बढ़ोतरी नहीं

हालांकि, 2011 से युवा पुरुष स्नातकों के शुरुआती वेतन में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है. इसके उलट, स्नातकों की कमाई में लिंग-आधारित वेतन का अंतर कम हुआ है; अब युवा महिला स्नातक भी अपने पुरुष साथियों के बराबर ही कमाई कर रही हैं.

जिन क्षेत्रों में युवाओं को काम मिलता है, उनमें काफी बदलाव आ रहे हैं. युवा मज़दूर, बुज़ुर्गों के मुकाबले खेती-बाड़ी का काम ज़्यादा तेज़ी से छोड़ रहे हैं. हालांकि, 2017 के बाद से खेती-बाड़ी में महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ी है, जबकि इस क्षेत्र में युवा पुरुषों की हिस्सेदारी वहीं की वहीं रुकी हुई है.

युवा महिलाओं को रोज़गार

युवा महिलाओं को अब ज़्यादातर आधुनिक सेवाओं में रोज़गार मिल रहा है, जिनमें सूचना तकनीक, ऑटोमोबाइल निर्माण, टेक्सटाइल और व्यापार सहयोग सेवाएं शामिल हैं. बुज़ुर्ग महिलाएं ज़्यादातर सामुदायिक और निजी सेवाओं में ही लगी हुई हैं. युवा पुरुषों के लिए शुरुआती स्तर पर रोज़गार देने वाले मुख्य क्षेत्र व्यापार, परिवहन और निर्माण हैं. रिपोर्ट में जाति और लिंग के आधार पर होने वाले काम के बंटवारे में कमी का भी ज़िक्र किया गया है.

(प्रतीकात्मक फोटो साभार: फेसबुक/Amity University)

पलायन और श्रम बाज़ार

उदाहरण के लिए 1983 में चमड़ा और जूते बनाने वाले उद्योग में काम करने वाले SC और ST समुदायों के युवाओं की हिस्सेदारी 40% थी; 2023 तक यह घटकर 24% रह गई. इन समुदायों के लिए सबसे ज़्यादा बढ़ोतरी कागज़, वाहन और दूरसंचार उपकरणों के निर्माण के क्षेत्र में हुई है.

पलायन (Migration), श्रम बाज़ार (Labour Market) के एक महत्वपूर्ण घटक के रूप में काम करता आ रहा है. अनौपचारिक प्रवासी श्रमिकों में युवाओं की हिस्सेदारी लगभग 40% है. बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे युवा राज्य ‘नेट सेंडर’ (श्रमिक भेजने वाले) के रूप में काम करते हैं, जबकि दिल्ली, हरियाणा और पंजाब बड़े ‘नेट रिसीवर’ (श्रमिक प्राप्त करने वाले) हैं, जिससे क्षेत्रीय असमानताओं में संतुलन बना रहता है.

ये सिफारिश की गई

इन चुनौतियों से निपटने के लिए रिपोर्ट में रोज़गार क्षमता बढ़ाने हेतु स्कूली और व्यावसायिक पाठ्यक्रमों को एकीकृत करने, श्रम बाज़ार की बाधाओं को कम करने के लिए राष्ट्रीय व्यवसाय सेवाओं (NCS) को मज़बूत करने और अनौपचारिक क्षेत्र तथा पलायन का सामना कर रहे युवा श्रमिकों को सहायता प्रदान करने के लिए सामाजिक सुरक्षा प्रणालियों का विस्तार करने की सिफारिश की गई है.

अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की अध्यक्ष इंदु प्रसाद ने कहा, ‘आज पहले के मुकाबले कहीं ज़्यादा युवा शिक्षित, जानकार और महत्वाकांक्षी हैं. ये ऐसी वास्तविक उपलब्धियां हैं, जिन पर हम गर्व कर सकते हैं.’

नीति बनाने में होगी आसानी

इस रिपोर्ट की मुख्य लेखक और अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र की एसोसिएट प्रोफेसर, रोज़ा अब्राहम ने कहा कि यह शोध एक युवा कामगार के शिक्षा से नौकरी की तलाश और फिर रोज़गार तक के सफ़र को दर्शता है.

उन्होंने कहा, ‘हमें उम्मीद है कि यह रिपोर्ट कुछ ऐसा बुनियादी काम सामने रखेगी, जिससे इस बदलाव में आने वाली चुनौतियों को बेहतर ढंग से समझने में मदद मिलेगी और एक तालमेल वाली नीति बनाने में आसानी होगी.’

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