अरावली पर्वत शृंखला (Aravalli Mountain Range) के संरक्षण को लेकर एक मुहिम के तहत पर्यावरणविद, अधिकार कार्यकर्ताओं और प्रभावित निवासियों ने एक मुहिम शुरू की है. इस मुहिम का नाम ‘अरावली संरक्षण यात्रा’ (Aravalli Sanrakshan Yatra) हैं और इसके तहत 700 किमी की पैदल यात्रा की जाएगी, जिसका मकसद अरावली पर्वतमाला की रक्षा करना है, जिसे दुनिया की सबसे पुरानी जीवित पर्वत प्रणाली और उत्तर पश्चिम भारत को रेगिस्तान बनने से बचाने वाली महत्वपूर्ण ढाल माना जाता है.
इस यात्रा की आधिकारिक घोषणा ‘अरावली विरासत जन अभियान’ ने की, जिसमें जाने-माने पर्यावरणविद्, पारिस्थितिकीविद्, वकील, शोधकर्ता, सामाजिक कार्यकर्ता और चार अरावली राज्यों: गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली के ग्रामीण-शहरी समुदाय के लोग शामिल हैं.
यात्रा का मकसद
एनडीटीवी की रिपोर्ट के अनुसार, ये पदयात्रा 24 जनवरी को गुजरात के अरावली ज़िले में शुरू होगी, वहां के तीन ज़िलों राजस्थान के 27 और हरियाणा के 7 ज़िलों से गुज़रते हुए 40 से ज़्यादा दिनों के बाद दिल्ली में खत्म होगी.
इस यात्रा का मकसद सीधे ग्रामीण समुदायों से जुड़ना है. इस पर्वत श्रृंखला की सुंदरता के साथ-साथ इसके नुकसान का दस्तावेजीकरण करना और कड़ी सुरक्षा के लिए माहौल बनाना है – अरावली को सिर्फ़ पहाड़ नहीं, बल्कि तेज़ी से सूखते उत्तर-पश्चिम भारत में लाखों लोगों के लिए पानी, हवा, जैव विविधता और रोज़ी-रोटी के एक अनमोल रक्षक के तौर पर पेश करना है.
सुप्रीम कोर्ट का फैसला
यह पहल हाल के न्यायिक और नीतिगत बदलावों को लेकर गहरी चिंता के माहौल में हो रही है. 20 नवंबर 2025 के एक फैसले में सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने एक सरकारी समिति की अरावली की संकीर्ण परिभाषा का समर्थन किया, जिसमें संरक्षित दर्जे को उन ज़मीनी बनावटों तक सीमित किया गया है, जो स्थानीय ज़मीन से कम से कम 100 मीटर ऊपर हैं या 500 मीटर के दायरे में हैं – जिससे इस पर्वत शृंखला के एक बड़े हिस्से पर खनन और विकास परियोजना का खतरा पैदा हो सकता था.
इस फैसले के व्यापक विरोध के बाद शीर्ष अदालत ने 29 दिसंबर 2025 को अपने ही आदेश पर रोक लगा दी और 21 जनवरी 2026 को सुनवाई के दौरान पहले की परिभाषा को रोकते हुए ज़्यादा कड़ी वैज्ञानिक समीक्षा के लिए एक नई उच्चाधिकार प्राप्त विशेषज्ञ समिति बनाने का प्रस्ताव दिया.
हालांकि, पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने इस कार्यवाही पर कड़ी निराशा जताई, खासकर प्रभावित समुदायों और पर्यावरणविदों की दखलअंदाजी की अर्जियों को सीमित रूप से स्वीकार किए जाने पर.
प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा
दिल्ली स्थित इंडियन वीमेंस प्रेस कॉर्प्स के (IWPC) में 22 जनवरी को हुई एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान अरावली विरासत जन अभियान (Aravalli Virasat Jan Abhiyan) की सदस्य नीलम अहलूवालिया ने कहा, ‘हम नागरिक जो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51A(g) के तहत अपने कर्तव्य को पूरा करने के लिए काम करते हैं, जो हर नागरिक को प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा करने और उसे बेहतर बनाने का आदेश देता है; हम 24 जनवरी को गुजरात के अरावली जिले में एक बहुत ही पवित्र यात्रा शुरू करने के लिए इकट्ठा होंगे.’
उन्होंने कहा, ‘पिछले कुछ दशकों से वनों की कटाई, लाइसेंस वाले और अवैध खनन (Licensed and Illegal Mining), रियल एस्टेट परियोजनाओं के विकास के कारण अरावली पहाड़ियों को काफी नुकसान पहुंचा है, जिसमें एक के बाद एक पहाड़ी को खत्म कर दिया जा रहा है और कचरा डंपिंग हमारे जलस्रोतों को ज़हरीला बना रही है.’
उन्होंने मांग की कि सुप्रीम कोर्ट 20 नवंबर 2025 के अपने फैसले को पूरी तरह से वापस ले, ‘पिछड़ी’ परिभाषा (Regressive Definition) को खत्म करे और एक उच्चाधिकार प्राप्त समिति बनाए, जिसमें समुदाय के प्रतिनिधि शामिल हों.
संवेदनशील क्षेत्र घोषित किया जाए
रिपोर्ट के अनुसार, अहलूवालिया ने कहा, ‘विशेषज्ञों के अलावा सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त नई ‘उच्चाधिकार प्राप्त समिति’ में खनन से प्रभावित समुदायों के प्रवक्ता शामिल होने चाहिए और उसे यह निर्देश देना चाहिए कि 4 राज्यों में फैली पूरी अरावली पर्वत शृंखला का एक स्वतंत्र और व्यापक सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभाव अध्ययन किया जाए.’
अहलुवालिया ने आग्रह किया और मांग की कि इस पर्वत शृंखला को पश्चिमी घाट (Western Ghats) की तरह पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ESA/Ecologically Sensitive Area) घोषित किया जाए.
प्रख्यात जल संरक्षणवादी डॉ. राजेंद्र सिंह ने कहा, ‘हम मांग करते हैं कि गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली में फैली अरावली पर्वत श्रृंखला को ‘संकटग्रस्त पारिस्थितिक क्षेत्र’ (Critical Ecological Zone) घोषित किया जाए. हमें उम्मीद है कि भारत का माननीय सुप्रीम कोर्ट ‘भारत के सबसे पुराने पहाड़ी पारिस्थितिकी तंत्र के तौर पर अरावली के अधिकारों’ को पहचानेगा.’
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NGT के आदेश का उल्लंघन
राजस्थान के कोटपुतली ज़िले की जोधपुरा संघर्ष समिति के प्रभुदयाल ने नवंबर 2025 में Ultra Tech सीमेंट की कार्यप्रणाली के खिलाफ नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के पक्ष में आए आदेश के बावजूद लगातार हो रहे उल्लंघनों की एक गंभीर तस्वीर पेश की.
उन्होंने कहा, ‘ज़मीनी हकीकत यह है कि NGT के आदेश के बावजूद जोधपुरा (जिला जयपुर) के लोगों को कोई राहत नहीं मिली है. खनन, विस्फोट और पत्थर तोड़ने की गतिविधियां अभी भी पहले की तरह चल रही हैं. जोधपुरा गांव के ज़्यादातर लोग स्किन रैशेज़, अस्थमा, नाक में जलन, जोड़ों में दर्द, बहरापन, एलर्जी, सांस लेने में दिक्कत, आंखों में जलन, एलर्जी वगैरह से पीड़ित हैं.’
पर्यावरण पर बुरा असर
रिपोर्ट के अनुसार, राजस्थान के सीकर के जमीनी कार्यकर्ता कैलाश मीणा ने ‘सस्टेनेबल’ खनन (Sustainable Mining- पर्यावरण को हानि पहुंचाए बिना होने वाला खनन) के विचारों को खारिज कर दिया. उन्होंने कहा, ‘खनन में कुछ भी सस्टेनेबल नहीं है, यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिससे समाज और पर्यावरण पर बुरे असर पड़ते हैं. कई खनन इलाकों में भूजल स्तर 1000 से 2000 फीट नीचे चला गया है. हम सड़कें, इमारतें, मंदिर बनाने और इस पत्थर को निर्यात करने के लिए अरावली रेंज को खत्म नहीं कर सकते.’
राजस्थान किसान मजदूर नौजवान सभा के संयोजक वीरेंद्र मौर ने किसानों के लिए अरावली पर्वत शृंखला की जीवनरेखा वाली भूमिका पर ज़ोर देते हुए कहा, ‘राजस्थान के उत्तरी और पूर्वी ज़िलों के लिए अरावली पर्वत श्रृंखला सिर्फ़ ज़मीन का एक हिस्सा नहीं है, बल्कि हमारे पानी के लिए जीवनरेखा है. अरावली पहाड़ियों के खत्म होने का मतलब है ज़मीन के अंदर और सतह दोनों तरह के पानी का तेज़ी से कम होना है.’
पहाड़ों और जंगलों से जीवन
आदिवासी एकता परिषद और भील जनजाति की युवा नेता कुसुम रावत ने इस पर्वतमाला से गहरे सांस्कृतिक संबंधों के बारे में बात की. उन्होंने कहा, ‘हमें अरावली पहाड़ों और जंगलों से जीवन मिलता है और हम उन्हें जीवित भगवान के रूप में पूजते हैं. खनन और इमारतें और रिसॉर्ट बनाने जैसी विनाशकारी गतिविधियों के लिए प्रकृति को नष्ट करना ‘प्रगति’ नहीं है. हम अपने पहाड़ों, नदियों, जंगलों – हमारे जीवित भगवानों – को नष्ट नहीं होने देंगे.’




