केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की एक विशेषज्ञ समिति ने अरुणाचल प्रदेश के अंजॉ में लोहित नदी पर 1,200 मेगावाट के कलाई-II हाइड्रोइलेक्ट्रिक परियोजना के लिए पर्यावरण मंजूरी देने की सिफारिश की है.
वहीं, पर्यावरणविदों और परियोजना से प्रभावित लोगों ने प्रस्ताव की पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) रिपोर्ट में लोहित नदी क्षेत्र में गंभीर रूप से लुप्तप्राय सफेद पेट वाले बगुले (White-bellied Heron Bird) की मौजूदगी को लेकर चिंता जताई है.
साल 2020 में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के तहत नदी घाटी और पनबिजली परियोजनाओं के लिए विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति (EAC) ने खुद लोहित नदी पर प्रस्तावित 1,750 मेगावाट लोअर डेमवे परियोजना (Lower Demwe Project) के लिए मंजूरी देते समय बगुले की इस प्रजाति के लिए एक विस्तृत संरक्षण योजना मांगी थी.
पर्यावरण मंजूरी की सिफारिश
आधिकारिक मिनट्स के अनुसार, मंत्रालय की समिति ने 19 दिसंबर 2025 की बैठक में कलाई-II हाइड्रो प्रोजेक्ट के लिए पर्यावरण मंजूरी की सिफारिश की थी. पर्यावरणीय प्रभाव आकलन रिपोर्ट सरकारी कंपनी और मान्यता प्राप्त सलाहकार WAPCOS लिमिटेड ने तैयार की थी.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, समिति की बैठक से एक दिन पहले अंजॉ (Anjaw) के चेंगंग गांव के सोबलाम मालो और असम के पर्यावरणविद बिमल गोगोई ने समिति को एक पत्र लिखकर पर्यावरणीय प्रभाव आकलन रिपोर्ट में कथित कमियों को उजागर किया और परियोजना का पक्षियों की प्रजातियों पर पड़ने वाले असर का पहले से आकलन करने की मांग की.
पक्षियों का कोई जिक्र नहीं
गोगोई ने कहा कि रिपोर्ट में ‘खतरे में पड़ी प्रजातियों का एक बार भी ज़िक्र नहीं किया गया’, जबकि ‘इस परियोजना से प्रभावित इलाका लोहित नदी क्षेत्र (Lohit River Basin), जिसमें कामलांग टाइगर रिज़र्व भी शामिल है, में इस पक्षी के हाल में रहने के रिकॉर्ड मिले हैं.’
गोगोई ने आगे कहा कि ‘हैरानी की बात है’ कि पर्यावरण आकलन रिपोर्ट में कामलांग टाइगर रिज़र्व (Kamlang Tiger Reserve) को सिर्फ़ एक अभयारण्य के तौर पर दर्ज किया गया है,
इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) रिपोर्ट के एवियन-फौना चैप्टर में, जो अध्ययन क्षेत्र में 19 परिवारों की कुल 28 प्रजातियों को रिकॉर्ड करता है, उसमें सफेद पेट वाले इस खास बगुले का कोई ज़िक्र नहीं है, जो वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत शेड्यूल-I (सबसे ज़्यादा सुरक्षा) वाली प्रजाति है.
गंभीर रूप से लुप्तप्राय पक्षी
इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ़ नेचर (IUCN) की रेड लिस्ट के अनुसार, यह पक्षी गंभीर रूप से लुप्तप्राय (Critically Endangered) है. स्वतंत्र शोधकर्ताओं और अरुणाचल वन विभाग के पिछले रिकॉर्ड के अनुसार, इस पक्षी की मौजूदगी कलाई-II परियोजना के ऊपरी और निचले दोनों तरफ दर्ज की गई है.
नेचर कंजर्वेशन फाउंडेशन के वैज्ञानिक रोहित नानीवाडेकर, जिन्होंने नामदफा टाइगर रिज़र्व में इस प्रजाति पर शोध किया है, ने बताया कि ये बगुले शांत और खुले में बहने वाली नदी वाले इलाकों को पसंद करते हैं और ज़्यादातर नदी के तेज़ बहाव में पाई जाने वाली मछलियों पर निर्भर रहते हैं.
पक्षियों की आबादी में कमी
उन्होंने कहा, ‘अरुणाचल प्रदेश में, इनकी आबादी लोहित, अंजॉ और चांगलांग ज़िलों में पाई जाती है, जिसमें कामलांग और नामदफा टाइगर रिज़र्व (Namdapha Tiger Reserves) भी शामिल हैं. हमें इनकी आबादी में कमी के कारणों की पूरी तरह से समझ नहीं है और नामदफा में, इनके रहने की जगह में ठीकठाक शांति होने के बावजूद ऐसा हो रहा है.’
उन्होंने आगे कहा, ‘हालांकि IUCN रेड लिस्ट के मुताबिक जंगल में 250 से भी कम पक्षी हैं, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि जंगल में सिर्फ़ 60 पक्षी बचे होंगे, जिनमें भूटान में 4-5 ब्रीडिंग जोड़े और पूर्वी अरुणाचल प्रदेश में उससे भी कम हैं.’
समिति ने जवाब नहीं दिया
बहरहाल, पर्यावरण मंत्रालय की विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति के अध्यक्ष IIT-रुड़की के प्रोफेसर गोविंद चक्रपाणि और मंत्रालय के वैज्ञानिक योगेंद्र पाल सिंह और समिति के सदस्य सचिव ने इंडियन एक्सप्रेस द्वारा उन्हें ईमेल पर भेजे गए सवालों का कोई जवाब नहीं दिया है. सलाहकार WAPCOS को भेजे गए ईमेल का भी कोई जवाब नहीं मिला है.
नाम न बताने की शर्त पर पक्षियों की प्रजाति पर काम काने वाले एक शोधकर्ता ने कहा, ‘नामदफा टाइगर रिज़र्व के अलावा भारत में वालॉन्ग (Walong) ही इन पक्षियों के घोंसला बनाने की एकमात्र जगह है. हमारे पास काहो से परशुराम कुंड तक लोहित नदी के पूरे इलाके में सीधे और अप्रत्यक्ष रूप से इनके देखे जाने के रिकॉर्ड हैं.’
प्रजातियों पर व्यापक असर
उन्होंने कहा, ‘वालॉन्ग में हमने इंसानी गड़बड़ी के कारण पक्षियों के घोंसले छोड़ने के मामले रिकॉर्ड किए हैं. फिलहाल, अरुणाचल प्रदेश में शिकार और रहने की जगह का नुकसान मुख्य मुद्दे हैं, जबकि भूटान के अध्ययन से पता चलता है कि बांधों का इन प्रजातियों पर व्यापक असर पड़ रहा है.’ वालॉन्ग, कलाई-II हाइड्रोइलेक्ट्रिक परियोजना के ऊपरी हिस्से में स्थित है.
रहने की जगह खत्म
वालॉन्ग और नामदफा में सफेद पेट वाले इस खास बगुले के घोंसले बनाने की जगहों को South Asian Ornithology की एक पत्रिका Indian Birds के जून 2023 संस्करण में भी रिकॉर्ड किया गया है.
पत्रिका के लेख में बताया गया है कि रहने की जगह खत्म होने, शिकार, इंसानी दखलअंदाजी की वजह से इन पक्षियों की संख्या में तेज़ी से गिरावट आई है. पुराने संरक्षण रणनीति दस्तावेज़ों में बांधों और बिजली की लाइनों से टकराने को भी खतरों के रूप में बताया गया है.
रिपोर्ट के अनुसार, THDC इंडिया लिमिटेड द्वारा विकसित की जानी वाली ये परियोजना, जिसकी अनुमानित लागत 14,176.26 करोड़ रुपये है, अंजॉ के हवाई गांव में ब्रह्मपुत्र की सहायक नदी लोहित पर बनाई जाएगी. इस परियोजना में 128.5 मीटर ऊंचा कंक्रीट ग्रेविटी डैम और एक अंडरग्राउंड पावरहाउस बनाया जाएगा.




