बिहार सरकार ने ‘नाम में गड़बड़ी’ के कारण JDU के मंत्री की सहायक प्रोफेसर के तौर पर नियुक्ति पर लगाई रोक

बिहार के ग्रामीण कार्य विभाग मंत्री अशोक चौधरी. (फोटो साभार: फेसबुक)

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बिहार के ग्रामीण कार्य विभाग मंत्री अशोक चौधरी के नाम को लेकर गड़बड़ी के कारण उनकी अपनी सरकार ने ही उन्हें सहायक राजनीतिक विज्ञान प्रोफेसर के पद पर नियुक्त करने से रोक दिया है. द इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी एक रिपोर्ट में इसका खुलासा किया है.

57 साल के अशोक चौधरी उन 274 उम्मीदवारों में से एक थे, जिन्होंने पिछले जून में राजनीतिक विज्ञान विषय के प्रोफेसर पद का इंटरव्यू पास किया था. यह इंटरव्यू बिहार राज्य विश्वविद्यालय सेवा आयोग (BSUSC) द्वारा इस पद का पहली बार विज्ञापन देने के पांच साल बाद हुआ था.

दो नामों का इस्तेमाल

सूत्रों के अनुसार, चौधरी को 17 अन्य उम्मीदवारों के साथ पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय अलॉट किया गया था, लेकिन नियुक्ति रोक दी गई, क्योंकि वह दो नामों का इस्तेमाल करते हैं, अपने ​शैक्षणिक प्रमाण पत्र में अशोक कुमार और चुनाव हलफनामे में अशोक चौधरी.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, विश्वविद्यालय सेवा आयोग के एक सूत्र ने कहा, ‘नाम में अंतर ही उनकी नियुक्ति को रोकने का मुख्य कारण है. शुरुआती जांच के समय हमने उनके शैक्षणिक प्रमाण पत्र देखे थे, लेकिन फाइनल जांच में दो नाम सामने आए हैं.’ एक उच्च शिक्षा अधिकारी ने कहा, ‘अशोक चौधरी का मामला कुछ स्पष्टीकरण की कमी के कारण विभाग के पास लंबित है, जिसमें नाम में अंतर भी शामिल है.’

चौधरी का टिप्पणी से इनकार

रिपोर्ट के अनुसार, चौधरी को छोड़कर बाकी उम्मीदवारों को पिछले महीने 10 राज्य विश्वविद्यालयों में की गई 4,000 नई नियुक्तियों के तहत नियुक्ति पत्र मिल गए थे.

इस बारे में पूछे जाने पर चौधरी ने टिप्पणी करने से मना कर दिया और कहा कि उन्हें ‘कोई जानकारी नहीं है’. हालांकि जदयू के एक वरिष्ठ नेता ने माना कि यह गलत दिख सकता है. उन्होंने कहा, ‘पहले सत्तारूढ़ पार्टी के एक मंत्री का चयन होना, विपक्ष की तरफ से हितों के टकराव के तौर पर हमले का कारण बना. अब नाम में गड़बड़ी से और ज़्यादा शर्मिंदगी हो रही है’.

नियुक्तियों की आलोचना

यह सब ऐसे समय में हुआ है जब नियुक्तियों की पहले से ही आलोचना हो रही है. बीते 15 दिसंबर को BSUSC ने इंटरव्यू के छह महीने बाद राजनीतिक विज्ञान विषय के उम्मीदवारों के लिए अप्रूव्ड कॉलेज अलॉटमेंट जारी किए.

यह तब हुआ जब कई चयनित उम्मीदवारों ने चांसलर (गवर्नर आरिफ मोहम्मद खान) को एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा, जिसमें दावा किया गया कि इस देरी से ‘बहुत ज़्यादा चिंता, परेशानी और मानसिक आघात’ पहुंचा है, क्योंकि यह प्रक्रिया पहले ही पांच साल से ज़्यादा समय तक खिंच चुकी है.

सितंबर 2020 में पहली बार विज्ञापन निकलने के बाद इन नियुक्तियों में कथित फर्जी अनुभव प्रमाण पत्र और रिसर्च पेपर को लेकर विवाद हुए, जिससे कई मुकदमे हुए और चयन प्रक्रिया लगभग पांच साल तक खिंच गई. नतीजे आखिरकार जून में घोषित किए गए और जबकि दूसरी स्पेशलाइजेशन के उम्मीदवारों को पहले ही उनका अलॉटमेंट मिल चुका था, राजनीतिक विज्ञान में और देरी हुई.

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