Akhlaq Lynching Case: उत्तर प्रदेश के गौतम बुद्ध नगर ज़िले के सूरजपुर में एक फास्ट-ट्रैक अदालत ने मंगलवार (23 दिसंबर, 2025) को 2015 में मोहम्मद अखलाक की पीट-पीटकर हत्या (Mob Lynching) मामले के आरोपियों के खिलाफ़ केस वापस लेने की उत्तर प्रदेश सरकार की याचिका खारिज कर दी.
अतिरिक्त ज़िला जज सौरभ द्विवेदी ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 321 के तहत सरकारी वकील की याचिका खारिज कर दी, जिसमें 14 आरोपियों के खिलाफ आरोप हटाने की मांग की गई थी.
6 जनवरी को अगली सुनवाई
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, अतिरिक्त जिला जज सौरभ द्विवेदी ने अपने आदेश में कहा, ‘अभियोजन पक्ष की प्रार्थना खारिज की जाती है.’ उन्होंने निर्देश दिया कि मामले को ‘सबसे महत्वपूर्ण’ कैटेगरी में रखा जाए और रोज़ाना इसकी सुनवाई हो. कोर्ट ने अभियोजन पक्ष को मामले में सबूत जल्द से जल्द रिकॉर्ड करने का भी निर्देश दिया. मामले की अगली सुनवाई 6 जनवरी, 2026 को होगी.
आदेश में कहा गया है, ‘गौतम बुद्ध नगर के पुलिस कमिश्नर/डीसीपी ग्रेटर नोएडा को एक पत्र भेजा जाए, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि सभी सबूत पूरी सुरक्षा के साथ जल्द से जल्द उपलब्ध कराए जाएं.’
बीते 15 अक्टूबर को यूपी सरकार ने इस मामले में मुकदमा वापस लेने के लिए एक प्रार्थना पत्र दिया था. इसके पीछे कई कारण बताए गए थे, जैसे अखलाक के परिवारवालों के आरोपियों के नाम बताने में कथित तौर पर अलग-अलग बयान, आरोपियों के पास से कोई हथियार या धारदार हथियार बरामद न होना और आरोपी और पीड़ित के बीच पहले से कोई दुश्मनी या मनमुटाव न होना.
अभियोजन पक्ष ने कहा था कि अखलाक की पत्नी इकरमन ने अपने बयान में आरोपियों की संख्या 10 बताई थी, जबकि अखलाक की बेटी शाइस्ता ने 16 और उनके बेटे दानिश ने 19 लोगों के नाम बताए थे.
2015 में क्या हुआ था
पीट-पीटकर हत्या का यह मामला 28 सितंबर 2015 का है, जब दादरी के बिसहड़ा गांव में अखलाक (50 वर्ष) के घर के बाहर भीड़ जमा हो गई थी. गांव के एक मंदिर से यह घोषणा की गई थी कि उन्होंने एक गाय को मारा है. अखलाक और उसके बेटे दानिश को उनके घर से बाहर खींचकर तब तक पीटा गया, जब तक वे बेहोश नहीं हो गए. जहां मोहम्मद अखलाक की नोएडा के एक अस्पताल में मौत हो गई थी, वहीं सिर पर गंभीर चोट लगने और सर्जरी के बाद दानिश को बच लिया गया था.
स्थानीय पुलिस ने जारचा पुलिस स्टेशन में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 (हत्या), 307 (हत्या की कोशिश), 147 (दंगा), 148 (घातक हथियार से दंगा), 149 (गैरकानूनी जमावड़ा), 323 (हमला), 504 (शांति भंग करने के इरादे से जानबूझकर अपमान करना) और अन्य धाराओं के तहत FIR दर्ज की थी.
23 दिसंबर 2015 को सूरजपुर में मजिस्ट्रेट कोर्ट में दायर चार्जशीट में पुलिस ने अखलाक की लिंचिंग के सिलसिले में एक नाबालिग समेत 15 लोगों के नाम शामिल किए थे. चार्जशीट में खास तौर पर गाय के मांस का ज़िक्र नहीं किया गया था, क्योंकि उस समय फाइनल फोरेंसिक रिपोर्ट नहीं आई थी. सभी आरोपी फिलहाल ज़मानत पर बाहर हैं.
फैसले का स्वागत
अखलाक के परिवारवालों ने अदालत के फैसले पर खुशी और राहत जताई. उनमें से एक ने कहा, ‘हमें उम्मीद है कि इस प्रक्रिया में अगले कदम जल्द से जल्द उठाए जाएंगे.’
अखलाक के वकील मोहम्मद यूसुफ सैफी ने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि अब जब कोर्ट ने अभियोजन पक्ष की तरफ से आरोप वापस लेने की अपील खारिज कर दी है, तो अब प्राथमिकता अभियोजन के गवाहों के बयान दर्ज करने की प्रक्रिया को तेज करना होगा.
सैफी ने कहा, ‘शाइस्ता का बयान पहले ही दर्ज हो चुका है, अखलाक की मां असगरी अब नहीं रहीं. यह घटना 28 सितंबर, 2015 को हुई थी और चार्जशीट दिसंबर 2015 को फाइल की गई थी, लेकिन आरोप तय करने में छह साल लग गए. हम इस फैसले से बहुत राहत महसूस कर रहे हैं.’




