Rich Country Poor Country Gap: संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार, अमीर और गरीब देशों के बीच की खाई और भी चौड़ी होती जा रही है, क्योंकि पिछले साल कई देशों द्वारा कई लक्ष्यों को लेकर बनी सहमति – जिनमें प्रमुख वैश्विक वित्तीय संस्थानों में सुधार करना भी शामिल था – अभी भी केवल अधूरे वादे ही बने हुए हैं.
यह रिपोर्ट पिछले साल जून में स्पेन के सेविले (Seville) में अपनाए गए उस मूल योजना (Blueprint) का मूल्यांकन करती है, जिसका उद्देश्य इस खाई को पाटना और 2030 के लिए संयुक्त राष्ट्र के विकास लक्ष्यों (United Nations Development Goals) को प्राप्त करना था. रिपोर्ट अगले सप्ताह वॉशिंगटन में होने वाली अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक (World Bank) की बैठकों से ठीक पहले जारी की गई. ये दोनों संस्थाएं आर्थिक विकास (Economic Development) को बढ़ावा देने वाले प्रमुख वैश्विक वित्तीय संस्थान (Global Financial Institutions) हैं.
ईरान युद्ध का प्रभाव
समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार, IMF की मैनेजिंग डायरेक्टर क्रिस्टालिना जॉर्जीवा (Kristalina Georgieva) ने कहा कि वैश्विक विकास के अनुमान को बेहतर बनाने की तैयारी थी, लेकिन ईरान युद्ध (Iran War) ने अब विश्व अर्थव्यवस्था (World Economy) के भविष्य को धुंधला कर दिया है.
आर्थिक और सामाजिक मामलों के लिए संयुक्त राष्ट्र (United Nations) के अवर महासचिव ली जुनहुआ (Li Junhua) ने कहा कि भू-राजनीतिक तनाव विकासशील देशों के लिए वित्तपोषण जुटाने की चुनौतियों को और बढ़ा रहे हैं.
उन्होंने कहा, ‘अंतरराष्ट्रीय सहयोग के लिए यह बेहद जोखिम भरा समय है, क्योंकि भू-राजनीतिक कारक आर्थिक संबंधों और वित्तीय नीतियों को तेज़ी से प्रभावित कर रहे हैं.’
बढ़ती खाई
रिपोर्ट में बढ़ते व्यापार अवरोधों और जलवायु से जुड़े बार-बार लगने वाले झटकों को भी इस बढ़ती खाई को और गहरा करने वाले कारकों के रूप में इंगित किया गया है.
सेविले में पिछले साल हुए सम्मेलन में, कई देशों के नेताओं ने सर्वसम्मति से ‘Seville Commitment’ को अपनाया था, जिसका उद्देश्य विकास कार्यों के लिए सालाना वित्तपोषण में मौजूद 4 ट्रिलियन डॉलर के अंतर को पाटना था. हालांकि इसमें अमेरिका सहमत नहीं था.
इसमें विकासशील देशों में निवेश बढ़ाने और विश्व बैंक तथा IMF सहित अंतरराष्ट्रीय वित्तीय ढांचे में सुधार करने का आह्वान किया गया था.
IMF और विश्व बैंक की आलोचना
संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस (Antonio Guterres) ने इन दोनों संस्थाओं में बड़े बदलावों की बार-बार मांग की है. उनका कहना है कि IMF ने गरीब देशों के बजाय अमीर देशों को फायदा पहुंचाया है और विश्व बैंक अपने मिशन में नाकाम रहा है – खासकर Covid-19 महामारी के दौरान, जिसने दर्जनों देशों को भारी कर्ज में डुबो दिया.
उनकी आलोचनाएं उन बाहरी आलोचकों की बातों से मेल खाती हैं, जो विकासशील देशों में इस बात को लेकर व्याप्त निराशा का ज़िक्र करते हैं कि वित्तीय संस्थानों में फैसले लेने की प्रक्रिया पर अमेरिका और उसके यूरोपीय सहयोगी हावी रहते हैं.
विकास सहायता कम
Seville Commitment को लागू करने पर संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में कहा गया है कि यह लगातार बढ़ते वित्तीय अंतर को पाटने की ‘सबसे बड़ी उम्मीद’ है.
लेकिन 2025 में संयुक्त राष्ट्र के अवर महासचिव ली जुनहुआ ने कहा था कि 25 देशों ने गरीब देशों को अपनी विकास सहायता कम कर दी, जिससे 2024 से कुल मिलाकर 23% की गिरावट आई, जो रिकॉर्ड तौर पर सबसे बड़ी वार्षिक गिरावट है. उन्होंने कहा, सबसे बड़ी गिरावट अमेरिका से 59% से थी. प्रारंभिक आंकड़ों के आधार पर ली ने कहा, 2026 में 5.8% की और गिरावट की उम्मीद है.
टैरिफ का प्रभाव
रिपोर्ट में कहा गया है कि टैरिफ – जिसमें ट्रंप प्रशासन द्वारा लगाए गए टैरिफ भी शामिल हैं – का विकासशील देशों पर बड़ा प्रभाव पड़ा है. रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया के सबसे गरीब देशों से निर्यात पर औसत टैरिफ 2025 में 9% से बढ़कर 28% हो गया और चीन को छोड़कर विकासशील देशों के लिए औसत टैरिफ 2% से बढ़कर 19% हो गया.




