क्रिसमस पर नफ़रत और हिंसा की घटनाएं निंदनीय, NAPM और सद्भाव मंच ने कहा- स्थिति बेहद चिंताजनक

(प्रतीकात्मक फोटो साभार: Pixabay)

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ईसाई धर्म के त्योहार क्रिसमस पर हुई नफरती हिंसा और गुंडागर्दी की ‘जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय’ (NAPM) और ‘सद्भाव मंच’ ने कड़े शब्दों में निंदा की है. इन संगठनों की ओर से ​कहा गया कि देश में ईसाई और मुस्लिम समुदायों के खिलाफ नफ़रत का जो माहौल बनाया जा रहा है, वह बेहद चिंताजनक है. एक तरफ प्रधानमंत्री क्रिसमस के कार्यक्रमों में शामिल होकर दिखावा कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ जमीन पर अल्पसंख्यकों पर हमले बढ़ रहे हैं.

संगठन की ओर से कहा गया कि हम सरकार से यह मांग करते हैं कि वह अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए धार्मिक अल्पसंख्यकों की संवैधानिक और मानवाधिकार, खासकर सुरक्षा, सम्मान और निडरता से अपने धर्म की अभिव्यक्ति के अधिकार को सुनिश्चित करे.

ईसाइयों का उत्पीड़न

बीते 4 जनवरी को दोनों संगठनों की ओर से जारी एक साझा बयान में कहा गया है कि भारत में ईसाइयों का उत्पीड़न पिछले एक दशक से बढ़ती हुई चिंता का विषय रहा है. बीते दिसंबर महीने में ही, जब क्रिसमस पर्व की तैयारियां चल रही थीं, तब दक्षिणपंथी ताकतों ने उन्हें निशाना बनाया. उन्होंने भारत के अलग-अलग राज्यों में कैरोल गायन और चर्च की प्रार्थनाओं में विघ्न डाला.

आगे कहा गया, सड़कों पर अपनी आजीविका के लिए सांता क्लाज़ की टोपियां बेचने वाले गरीब रेहड़ी-पटरी वालों को बेरहमी से पीटा गया. लोगों और दुकानदारों से ईसाई त्योहारों का बहिष्कार करने को कहा गया. इस नफ़रत, हिंसा और डराने-धमकाने का कार्य काफी हद तक घृणा-भरी ‘हिंदुत्व विचारधारा’ में विश्वास रखने वाले समूहों ने किया, जो ‘भारतीय संस्कृति को बचाने’ का दावा करते हैं. कई जगहों पर इन कोशिशों को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से आधिकारिक संरक्षण भी प्राप्त हुआ.


संगठनों की मांग

1. NAPM और सद्भाव मंच ने केंद्रीय गृह मंत्री से बिना किसी देरी के हस्तक्षेप करने और सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को स्पष्ट निर्देश जारी करने की मांग की है. अन्य मांगें इस प्रकार है:

2. ईसाईयों या मुसलमानों के त्योहारों के दौरान या किसी भी समय उनके खिलाफ़ होने वाली हिंसा, धमकी और उत्पीड़न को रोका जाए.

3. चर्चों, मस्जिदों, प्रार्थना स्थलों, कैरोल समूहों और सामुदायिक कार्यक्रमों को पर्याप्त सुरक्षा मुहैया कराई जाए.

4. उन सभी श्रमिकों, नागरिकों और अल्पसंख्यक समुदायों को मुआवज़ा दिया जाए जिन्हें नफ़रत भरे अपराधों की वजह से अपनी आजीविका का नुकसान उठाना पड़ा है या जिनके धार्मिक स्थलों पर हमला हुआ है.

5. अवैध हिरासत, मौलिक अधिकारों के हनन और भीड़ की हिंसा को रोकने में नाकाम रहने वाले पुलिस और जिला प्रशासन की जवाबदेही तय की जाए.

6. धर्मांतरण विरोधी कानूनों के दुरुपयोग को रोका जाए, जिनका इस्तेमाल केवल अल्पसंख्यकों को डराने के लिए किया जा रहा है और जिनमें सजा की दर शून्य है. बिना पूरी जांच, सबूत और अदालती निगरानी के कोई गिरफ्तारी नहीं होनी चाहिए. संवैधानिक न्याय के नज़रिए से इन सभी कानूनों की समीक्षा की जाए.


संविधान का सीधा उल्लंघन

NAPM और सद्भाव मंच की ओर से जारी बयान के अनुसार, ये घटनाएं सामूहिक रूप से भारत के संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 19, 21 और 25 से 28 का सीधा उल्लंघन हैं. हम सत्ता में बैठे लोगों की बातों और उनके काम के बीच के इस बड़े फर्क की कड़ी निंदा करते हैं.

संगठनों के मुताबिक, पिछले कुछ महीनों में एक तरफ जहां प्रधानमंत्री और उप-राष्ट्रपति क्रिसमस के कार्यक्रमों में शामिल हुए, वहीं दूसरी तरफ जमीन पर हिंसा और डराने-धमकाने वालों के खिलाफ कोई सख्त कार्यवाही नहीं की गई. NAPM और सद्भाव मंच भारत में धर्म के नाम पर होने वाले हर जुल्म के खिलाफ हैं. हम उन सभी लोगों के साथ मज़बूती से खड़े हैं, जिनका उत्पीड़न किया जा रहा है.

सरकार की जिम्मेदारी

बयान में कहा गया, भारत का संविधान धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों पर आधारित है और सरकार की यह जिम्मेदारी है कि वह सभी धर्मों से एक समान दूरी बनाए रखे, लेकिन सांप्रदायिक नफ़रत और हिंसा की बार-बार होने वाली घटनाएं एक अलग ही हकीकत बयां करती हैं. दक्षिणपंथी संगठन ईसाई त्योहारों पर हमले कर रहे हैं और हर सामूहिक प्रार्थना, कैरोल गायन और कार्यक्रम को ‘जबरन धर्मांतरण’ की कोशिश करार दे रहे हैं.

आगे कहा गया, ‘जबरन धर्मांतरण’ का यह गलत डर फैलाना, धर्मांतरण विरोधी कानूनों का लगातार दुरुपयोग, मनमानी गिरफ्तारियां, त्योहार मनाने के लिए अनुमति न देना और धार्मिक आयोजनों के दौरान अल्पसंख्यकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करने में विफलता, ये सब मोदी सरकार के तहत देश में संवैधानिक शासन की नाकामी को दर्शाते हैं.

दिसंबर 2025 में आईं नफ़रती हिंसा की खबरें

मध्य प्रदेश: झाबुआ में प्रशासन ने धर्मांतरण का बहाना बनाकर क्रिसमस कैरोल पर रोक लगा दी. 18 दिसंबर को हाईकोर्ट के दखल के बाद ही यह पाबंदी हट सकी.

मध्य प्रदेश: जबलपुर में 20 दिसंबर को एक चर्च में दृष्टिहीन बच्चों के खाने के कार्यक्रम को बीजेपी की एक महिला लीडर ने रुकवा दिया और उन पर झूठे इल्जाम लगाए.

केरल: 21 दिसंबर की रात पलक्कड़ में क्रिसमस कैरोल गा रहे बच्चों के साथ मारपीट की गई और उनके वाद्य यंत्र तोड़ दिए गए.

दिल्ली: 22 दिसंबर को लाजपत नगर में सांता कैप पहनी महिलाओं और बच्चों को बजरंग दल के लोगों ने डराया-धमकाया.

ओडिशा: भुवनेश्वर में क्रिसमस का सामान बेचने वाले छोटे दुकानदारों को डराकर उनकी दुकानें बंद करा दी गईं.

महाराष्ट्र: पुणे में 22 दिसंबर को एक पेट्रोल पंप के कर्मचारियों के सांता कैप पहनने पर VHP और बजरंग दल के लोगों ने मालिक को धमकी दी.

छत्तीसगढ़: राज्य के कांकेर जिले में 18 दिसंबर को अंतिम संस्कार के रीति-रिवाजों को लेकर शुरू हुआ विवाद इतना बढ़ गया कि भीड़ ने हिंसा और आगजनी शुरू कर दी. ईसाइयों के घरों और प्रार्थना केंद्रों को जलाया गया और कई लोग घायल हुए. वहां रहने वालों का आरोप है कि हिंदुत्ववादी संगठनों ने भीड़ को भड़काया, जिससे आदिवासी ईसाई समुदायों की असुरक्षा और बढ़ गई है.

असम: 24 दिसंबर को गुवाहाटी से करीब 65 किलोमीटर दूर नलबाड़ी में VHP और बजरंग दल के लोगों ने ‘सांता मैरी इंग्लिश स्कूल‘ में क्रिसमस ईव के जश्न को रुकवाया और वहां की सजावट में तोड़फोड़ की.

उत्तर प्रदेश: राज्य में 25 दिसंबर की पारंपरिक सरकारी छुट्टी को रद्द करके स्कूलों को खुला रखने और एक राजनेता की जयंती मनाने का फैसला लिया गया. यह अल्पसंख्यक समुदायों को समाज से अलग-थलग करने वाला एक गहरा संदेश देता है.

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