विनोद कुमार शुक्ल: लेखक तो सभी जाते हैं, पर हर लेखक के जाने पर भाषा इतनी बेचैन नहीं होती

विनोद कुमार शुक्ल. (फोटो साभार: ​विकिपीडिया)

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त्रिभुवन

आज जब अप्रतिम साहित्यकार विनोद कुमार शुक्ल का देह-दीप बुझा है तो पिछले दिनों उठाए गए वे ‘कितने में बिके?’ वाले प्रश्न— काग़ज़ की तरह नहीं, काग़ज़-की-चिंदियों की तरह उड़ते दिखते हैं.

यह सवाल दरअसल साहित्य पर नहीं, अपने-अपने भीतर के उस छोटे से कैश-काउंटर पर था, जहां लोग कविता की धड़कन को भी सिक्कों की खनक में बदलकर सुनना चाहते हैं.

और देखिए, आज पूरा सोशल मीडिया श्रद्धांजलियों की बारिश में भीग रहा है. इंस्टा की कहानियां, एक्स के थ्रेड्स, ह्वाट्सऐप के स्टेटस, सब जगह उनकी पंक्तियां ऐसे तैर रही हैं, जैसे किसी नदी में पुराने दीपक, जिनकी लौ छोटी है, पर पानी में भी चमक बनकर रह जाती है.

यह दृश्य एक अत्यंत शिष्ट, पर निर्णायक उत्तर है.

लेखक तो सभी जाते हैं, पर हर लेखक के जाने पर भाषा इतनी बेचैन नहीं होती. युवा पीढ़ी इतनी बेचैन नहीं हुआ करती.

हर मृत्यु के बाद भीगे शब्दों का ऐसा फैलाव नहीं होता, यह साझा मौन, यह साझा थरथराहट, यह कलेक्टिव ट्रैमर नहीं आता.

रॉयल्टी का हिसाब किताब, मेरे प्रिय संशयशील मित्रों, बहीखातों में नहीं खुलता; वह तब खुलता है, जब लेखक चला जाता है और उसके बाद भी लोग—बिना किसी प्रचार-तंत्र के आदेश के, बिना किसी प्रकाशक के पोस्टर के, उसकी एक पंक्ति को ऐसे पकड़ लेते हैं, जैसे रात में टॉर्च की पतली रोशनी.

यहां ‘बिक्री’ नहीं, वापसी होती है, पाठक अपने भीतर लौटता है और लौटते हुए वह जिस दरवाज़े पर हाथ रखता है, वह विनोद कुमार शुक्ल की भाषा का दरवाज़ा होता है.

किसी ने कहा था: ‘इतनी बड़ी रॉयल्टी?’

आज उत्तर है: इतनी बड़ी स्मृति.

आज उत्तर है: इतनी बड़ी जगह.

आज उत्तर है: इतना बड़ा सन्नाटा.

यदि बाजार सचमुच सर्वशक्तिमान होता तो वह हर लेखक की मृत्यु पर ऐसा कर सकता था. पर बाजार के पास आंकड़े हैं; आंसू नहीं. उसके पास पोस्ट हैं; स्मरण नहीं. उसके पास प्रचार है; प्रेम नहीं.

विनोद कुमार शुक्ल का साहित्य, उस ‘आशु’ लेखन की तरह नहीं था, जिसे पढ़कर भूल जाया जाए; वह उन वस्तुओं में था, जिन्हें पढ़कर भूलना मुश्किल हो जाता है. एक साधारण-सी कुर्सी पर बैठी एकांत की गरिमा, एक दीवार में खुलती खिड़की, हवा में धूल की चमक और भाषा के भीतर छिपी वह धीमी-सी करुणा, जो चिल्लाती नहीं, बस साथ चलती है.

और इसलिए, आज जब सब जगह श्रद्धांजलियां हैं, तब यह समझना ज़रूरी है कि विनोद कुमार शुक्ल ‘बिके’ नहीं थे, वे ‘बचे’ रहे.

वे मनुष्य की स्मृति में बचते रहे और यही साहित्य का सबसे बड़ा, सबसे निष्कपट, सबसे अमूल्य हिसाब है. यानी

न रकम,

न उपेक्षा

न अन्यमनस्कता!

एक अप्रतिम साहित्यकार के प्रति अप्रतिम संवेदना!

(य​ह लेख मूल रूप से पत्रकार त्रिभुवन के फेसबुक पेज पर प्रकाशित हुआ.)

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