मध्य प्रदेश के ग्रामीण इलाकों का एक-तिहाई से ज़्यादा पानी इंसानों के पीने लायक नहीं: रिपोर्ट

(प्रतीकात्मक फोटो साभार: Pixabay)

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Unsafe Drinking Water: मध्य प्रदेश के शहरों की क्या बात की जाए यहां के गांवों में भी साफ पीने का पानी मिलना दुर्लभ हो गया है. केंद्र सरकार के जल जीवन मिशन (Jal Jeevan Mission) की एक नई रिपोर्ट से पता चलता है कि राज्य में एक-तिहाई से ज़्यादा ग्रामीण पीने का पानी इंसानों के पीने लायक नहीं है, जिससे लाखों लोग अनदेखे लेकिन जानलेवा प्रदूषण के संपर्क में आ रहे हैं.

बीते 4 जनवरी को जारी कार्यक्षमता मूल्यांकन रिपोर्ट (Functionality Assessment Report) के अनुसार, मध्य प्रदेश में सिर्फ़ 63.3% पानी के नमूने गुणवत्ता परीक्षण (Quality Test) में पास हुए, जबकि राष्ट्रीय औसत 76% था. इसका मतलब है कि राज्य में 36.7% ग्रामीण पीने के पानी के नमूने असुरक्षित पाए गए, जिनमें बैक्टीरियल या केमिकल प्रदूषण था.

पीने का असुरक्षित पानी

सितंबर-अक्टूबर 2024 में मध्य प्रदेश के 15,000 से ज़्यादा ग्रामीण घरों से नमूनों इकट्ठा किए गए थे.

एनडीटीवी की रिपोर्ट के अनुसार, इलाज और सुरक्षा के लिए बनी जगहों पर स्थिति और भी ज़्यादा चिंताजनक है. सरकारी अस्पतालों में सिर्फ़ 12% पानी के नमूने माइक्रोबायोलॉजिकल सुरक्षा परीक्षण में पास हुए, जबकि राष्ट्रीय औसत 83.1% है. मध्य प्रदेश के लगभग 88% अस्पताल मरीज़ों को असुरक्षित पीने का पानी दे रहे हैं.

स्कूलों में 26.7% नमूने माइक्रोबायोलॉजिकल परीक्षण में फेल हो गए, जिससे बच्चे रोज़ाना दूषित पानी के संपर्क में आ रहे हैं.

आदिवासी बहुल जिलों में भी दूषित पानी

अनूपपुर और डिंडोरी जैसे आदिवासी बहुल जिलों में पानी का एक भी नमूना सुरक्षित नहीं पाया गया. बालाघाट, बैतूल और छिंदवाड़ा में 50% से ज़्यादा पानी के नमूने दूषित पाए गए।

इसके अलावा मध्य प्रदेश में सिर्फ़ 31.5% घरों में नल कनेक्शन हैं, जो राष्ट्रीय औसत 70.9% से बहुत कम है.

जहां पाइपलाइन हैं भी, वहां भी सिस्टम खराब है; 99.1% गांवों में पाइप से पानी की सप्लाई है, लेकिन सिर्फ 76.6% घरों में ही नल काम कर रहे हैं. इसका मतलब है कि हर चौथे घर में नल खराब है या बिल्कुल पानी नहीं आता.

इंदौर का हाल

इससे भी बुरी बात यह है कि नल का पानी सुरक्षित पानी नहीं होता. इंदौर ज़िले में, जिसे आधिकारिक तौर पर 100% कनेक्टेड घोषित किया गया है, सिर्फ़ 33% घरों को ही सुरक्षित पीने का पानी मिलता है.

पूरे राज्य में 33% पानी के नमूने गुणवत्ता परीक्षण में फेल हो गए, जिससे यह पक्का होता है कि संकट सिर्फ पानी मिलने का नहीं है, बल्कि ज़हरीले पानी की सप्लाई का भी है.

रिपोर्ट के अनुसार, केंद्र सरकार ने इस स्थिति को ‘सिस्टम की वजह से आई आपदा’ बताया है और चेतावनी दी है कि अगर पानी की गुणवत्ता में सुधार नहीं हुआ, तो इस साल फंडिंग कम की जा सकती है.

पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी

यह चेतावनी ऐसी दुखद घटना के बाद आई है, जिसमें इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पानी पीने से कम से कम 18 लोगों की मौत हो गई. 429 लोगों को अस्पताल में भर्ती कराया गया, जिनमें से 16 इंटेंसिव केयर यूनिट (ICU) में हैं और तीन वेंटिलेटर पर हैं.

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने अब इस संकट को औपचारिक रूप से पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी मान लिया है. अपने आदेश में अदालत ने कहा कि ‘अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार में साफ पीने के पानी का अधिकार भी शामिल है’ और मौजूदा स्थिति पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी के दायरे में आती है.

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