बृहन्मुंबई महानगर पालिका (BMC): बीते 3 सालों में विकास का 99% फंड भाजपा नेतृत्व वाले सत्ताधारी गठबंधन के वार्डों को मिला

बृहन्मुंबई महानगर पालिका का कार्यालय. (फोटो साभार: विकिपीडिया)

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BMC Elections: मुंबई में 15 जनवरी को नगर निगम चुनाव होने वाले हैं. इस बीच सूचना के अधिकार (RTI) अधिनियम के तहत कुछ जानकारियां सामने आई हैं, जो काफी चौंकाने वाली हैं. RTI अधिनियम के तहत मिले रिकॉर्ड्स की जांच में पता चला है कि पिछले तीन सालों में बृहन्मुंबई महानगर पालिका (BMC) द्वारा विकास कार्यों के लिए आवंटित 99 प्रतिशत से ज़्यादा फंड बीजेपी के नेतृत्व वाले महायुति गठबंधन के विधायकों द्वारा प्रतिनिधित्व वाले निर्वाचन क्षेत्रों के वार्डों में गया.

द इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी एक विशेष रिपोर्ट में यह जानकारी दी है.

RTI से पता चलता है कि फरवरी 2023 और अक्टूबर 2025 के बीच BMC ने सड़क मरम्मत, ड्रेनेज अपग्रेड, स्वास्थ्य सुविधाओं और आस-पड़ोस के सौंदर्यीकरण जैसे नागरिक विकास के लिए 1,490.66 करोड़ रुपये से ज़्यादा मंज़ूर किए.

बीजेपी विधायकों को सबसे ज्यादा फंड

रिकॉर्ड्स के मुताबिक, इसमें से 1,476.92 करोड़ रुपये BJP, अजीत पवार के नेतृत्व वाली NCP और एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना के सत्ताधारी गठबंधन के विधायकों, MLC और सांसदों के इलाकों में गए.

BJP के विधायकों को सबसे बड़ा हिस्सा (1076.7 करोड़ रुपये) और उसके बाद शिंदे की शिवसेना के विधायकों को (372.7 करोड़ रुपये) ​मिला.

विपक्ष को न के बराबर फंड

इसके बिल्कुल उलट इस दौरान विपक्ष को सिर्फ 13.74 करोड़ रुपये, यानी 0.9 प्रतिशत ही दिए गए – और वह भी कांग्रेस के एक विधायक अमीन पटेल को, जो दक्षिण मुंबई के मुंबादेवी निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं, जहां अल्पसंख्यकों की अच्छी खासी आबादी है. बाकी में से शिवसेना (UBT) के सभी 10 विधायकों, कांग्रेस के दो अन्य विधायकों और सपा के एक विधायक को कोई फंड नहीं मिला.

निष्पक्ष शासन पर सवाल

रिपोर्ट के अनुसार, यह असंतुलन उसी पैटर्न की तरह है, जिसके बारे में द इंडियन एक्सप्रेस ने जनवरी 2024 में एक रिपोर्ट की थी, जब RTI से पता चला था कि अस्थायी नीतियों के शुरुआती चरण में बांटे गए पूरे 500 करोड़ रुपये सिर्फ सत्ताधारी पार्टी के विधायकों को मिले थे.

ये नतीजे भारत के सबसे अमीर नगर निकाय में निष्पक्ष शासन पर सवाल उठाते हैं, जिसका सालाना बजट 74,000 करोड़ रुपये से ज़्यादा है, खासकर तब जब BMC चुनाव बस कुछ ही दिन दूर हैं.

रिपोर्ट के अनुसार, फरवरी 2023 और नवंबर 2024 के बीच सत्तारूढ़ महायुति के पास मुंबई से 21 विधायक थे, जबकि विपक्षी महा विकास अघाड़ी (MVA) के पास 15 विधायक थे. नवंबर 2024 में विधानसभा चुनावों के बाद महायुति ने विपक्ष से एक और सीट छीन ली. वहीं जब सांसदों की बात आती है, तो MVA का पलड़ा भारी है, जिसके छह में से चार सांसद हैं.

सत्ताधारी विधायकों को सारा पैसा

मौजूदा वित्त वर्ष में अब तक 360 करोड़ रुपये बांटे गए हैं और यह सारा पैसा सत्ताधारी विधायकों को दिया गया है.

विधायकों में घाटकोपर पश्चिम (BJP) के राम कदम 70 करोड़ रुपये के नागरिक फंड के साथ सबसे ज़्यादा पैसा पाने वाले विधायक बने. 35 करोड़ रुपये (वित्त वर्ष 2023-24), 17.5 करोड़ रुपये (वित्त वर्ष 2024-25), 17.5 करोड़ रुपये (वित्त वर्ष 2025–26) मिले.

इसके बाद BJP के योगेश सागर (चारकोप) 67.47 करोड़ रुपये के साथ दूसरे नंबर पर रहे. उनके बाद पार्टी के साथी अतुल भातखलकर (कांदिवली पूर्व) 66.06 करोड़ रुपये के साथ तीसरे नंबर पर रहे.

विपक्ष को नहीं मिला फंड

रिपोर्ट के अनुसार, फंड बांटने का समय चिंताओं को और बढ़ाता है. 2024 के लोकसभा और विधानसभा चुनावों से पहले के महीनों में RTI रिकॉर्ड से पता चलता है कि सत्ताधारी पार्टी के मौजूदा नेताओं को 467 करोड़ रुपये से ज़्यादा जारी किए गए, जबकि लगभग सभी विपक्षी विधायकों को कोई फंड नहीं मिला.

15 अक्टूबर को आचार संहिता लागू होने से कुछ हफ्ते पहले अगस्त और सितंबर 2024 के बीच सत्ताधारी गठबंधन BJP और शिवसेना (शिंदे) के 23 विधायकों को नागरिक फंड से कुल 357.3 करोड़ रुपये मिले. विपक्षी विधायकों में सिर्फ कांग्रेस के अमीन पटेल को टोकन के तौर पर 3.92 करोड़ रुपये मिले.

MLC को दिए गए फंड

कुल रकम में मुंबई के उन विधान परिषद सदस्यों (MLCs) को दिए गए फंड भी शामिल हैं, जो किसी भी निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं.

रिकॉर्ड्स से पता चलता है कि इस समूह में भी विपक्ष के पांच में से किसी भी MLC को फंड नहीं दिया गया. इनमें से कम से कम दो शिवसेना (UBT/उद्धव गुट) के सचिन अहीर और NCP (SP/शरद पवार गुट) के सुनील शिंदे ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि उन्होंने नागरिक विकास के लिए फंड मांगा था, लेकिन उनके अनुरोधों को नज़रअंदाज़ कर दिया गया.

BJP के प्रवीण दारेकर इस सूची में 33 करोड़ रुपये के साथ सबसे ऊपर रहे: वित्त वर्ष 2024-25 और वित्त वर्ष 2025-26 में उन्हें 17.5 करोड़-17.5 करोड़ रुपये मिले.

फंड आवंटन की नई नीति

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, फंड आवंटन में इस असंतुलन की जड़ में फरवरी 2023 में लाई गई एक नीति है, जब मार्च 2022 में BMC की चुनी हुई पार्षदों की इकाई का कार्यकाल खत्म होने के बाद उसे भंग कर दिया गया था और सरकार द्वारा नियुक्त एक प्रशासक के हवाले कर दिया गया था.

चुने हुए पार्षदों की गैरमौजूदगी में विधायकों और सांसदों को 227 वार्डों के लिए विकास के कामों का प्रस्ताव देने का अधिकार दिया गया था – यह एक अस्थायी प्रशासनिक कदम था, जिसका मकसद नागरिक व्यवस्था को ठप होने से रोकना था.

मुंबई के अभिभावक मंत्री

लेकिन, असल में यह नीति विधायकों और सांसदों की मांगों के आधार पर फंड देने की शक्ति को मुंबई के अभिभावक मंत्रियों (Guardian Ministers) के हाथों में केंद्रित करती है. इन मंत्रियों में 2023-24 से शिवसेना के दीपक केसरकर (शहर) और बीजेपी के मंगल प्रभात लोढ़ा (उपनगर); और इस साल जनवरी से उप-मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे (शहर) और बीजेपी के आशीष शेलार (उपनगर) शामिल हैं.

अभिभावक मंत्री भारत में एक कैबिनेट-स्तर का मंत्री होता है, जिसे राज्य सरकार द्वारा राज्य के किसी खास जिले के विकास की देखरेख के लिए नियुक्त किया जाता है.

फंड आवंटन का किया बचाव

इंडियन एक्सप्रेस ने जब आशीष शेलार से संपर्क किया, तो उन्होंने कहा, ‘सभी फंड का बंटवारा BMC के नियमों के अनुसार किया गया है, और इसमें किसी भी तरह के भेदभाव का सवाल ही नहीं है.’ रिपोर्ट के अनुसार, एकनाथ शिंदे या उनके प्रतिनिधियों ने टिप्पणी के लिए किए गए अनुरोधों का जवाब नहीं दिया.

एक वरिष्ठ BMC अधिकारी ने कहा, ‘विधायक और सांसद फंड पाने के लिए अभिभावक मंत्रियों और प्रशासक, जो BMC कमिश्नर हैं, को लिखते हैं. इन प्रस्तावों के आधार पर अभिभावक मंत्री फंड को मंज़ूरी देते हैं, जिसे बाद में BMC द्वारा जारी किया जाता है.’

टिप्पणी से इनकार

वहीं, BMC कमिश्नर भूषण गागरानी ने 15 जनवरी के चुनावों के लिए लागू आचार संहिता का हवाला देते हुए इस मामले को लेकर कोई भी टिप्पणी करने से इनकार कर दिया.

कई विपक्षी विधायकों ने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि नागरिक काम ‘सिर्फ राजनीति के बारे में नहीं है’. वे कहते हैं कि हर लंबित प्रस्ताव के पीछे ‘हज़ारों लोग बुनियादी सेवाओं का इंतज़ार कर रहे होते हैं’, जैसे कि झुग्गी-झोपड़ियों में टूटे हुए टॉयलेट, बंद नालियां और खराब सड़कें.

सत्ताधारी पार्टी के नेता इस असंतुलन का कारण विपक्षी विधायकों के ‘अधूरे प्रस्तावों’ को बताते हैं. हालांकि, विपक्षी विधायक इसका जवाब देते हैं कि प्रस्ताव बार-बार जमा किए गए थे और मंज़ूरी के चरण पर रोक दिए गए.

नैरेटिव कंट्रोल का मामला

मुंबई विश्वविद्यालय में सार्वजनिक नीति विशेषज्ञ और प्रोफेसर मृदुल नील ने कहा, ‘विकास की झलक दिखाना ही नैरेटिव कंट्रोल है. पैसा कहां जाता है, यह तय करता है कि चुनाव से पहले पॉलिटिकल नैरेटिव पर किसका कब्ज़ा होगा. मरम्मत की गईं सड़कें, पार्क और स्ट्रीट लाइट शासन और विकास कार्यों के ठोस उदाहरण हैं, जिन्हें सत्ताधारी विधायक मतदाताओं को दिखा सकते हैं.’

BMC अधिकारियों के अनुसार, नगर निकाय के अलग-अलग विभाग शहर के सभी इलाकों में बुनियादी रखरखाव का काम कर रहे हैं, जिसमें पानी की सप्लाई और सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट जैसी बुनियादी सुविधाएं और सेवाएं शामिल हैं.

उन्होंने बताया कि विधायकों और सांसदों (और पहले पार्षदों) की मांगों पर आवंटित किए गए नगर निगम के फंड से सुविधाओं को अपग्रेड किया जाता है, जैसे फुटपाथ, सड़कों और नालियों की मरम्मत; कब्रिस्तान, लाइब्रेरी और बगीचे; कचरा निपटान क्षेत्रों का विकास; सामुदायिक शौचालयों का निर्माण और मरम्मत और सौंदर्यीकरण परियोजनाएं.

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