सरकार के नाम पत्र- ‘नया अधिनियम मनरेगा से मिली सामाजिक और लोकतांत्रिक उपलब्धियों को नष्ट कर देगा’

(फाइल फोटो साभार: फेसबुक/मनरेगा मजदूर)

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महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) को खत्म कर उसकी जगह लाए गए नए अधिनियम के खिलाफ वैज्ञानिकों, शिक्षाविदों, नागरिक समाज संगठनों और जमीनी कार्यकर्ताओं की ओर से भारत सरकार को संबोधित एक खुला पत्र लिखा गया है.

इसमें कहा गया है, ‘हम सरकार से आग्रह करते हैं कि महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) को समाप्त करने के बजाय उसके क्रियान्वयन में मौजूद समस्याओं को दूर करने के लिए जमीनी शोध और व्यापक परामर्श की प्रक्रिया अपनाई जाए.’

इसके अनुसार, ‘हम मनरेगा को निरस्त कर उसकी जगह ‘विकसित भारत – रोजगार और आजीविका गारंटी मिशन (ग्रामीण) (VB-G RAM G अधिनियम, 2025)’ लाने के पीछे दी गईं दलीलों में मौजूद कई गंभीर खामियों की ओर ध्यान दिलाना चाहते हैं. हमारे अनुसार, मनरेगा में जिन समस्याओं की पहचान के आधार पर नया विधेयक लाया गया है, वह अधूरी और सतही है.’

गहराई से विश्लेषण किया जाए

अधिकार कार्यकर्ताओं ने पत्र में कहा है, ‘अगर समस्याओं का गहराई से जमीनी स्तर पर विश्लेषण किया जाए, तो ऐसे समाधान निकल सकते हैं, जो मनरेगा की मूल भावना- अधिकार-आधारित, समावेशी और समुदायों को सशक्त बनाने वाले कार्यक्रम को आगे भी मजबूत किया जा सकता है.’

नए अधिनियम और उससे जुड़े दस्तावेज़ (जैसे बैकग्राउंडर नोट्स) मनरेगा में निम्नलिखित समस्याओं की पहचान करते हैं और उनके समाधान नए कानून के माध्यम से संभव हैं:

1. मांग-आधारित स्वरूप (Demand-driven operation)

बताई गई समस्या: मनरेगा का खुला, मांग-आधारित स्वरूप आज की ग्रामीण वास्तविकताओं से मेल नहीं खाता, क्योंकि आजीविकाएं अधिक विविध और डिजिटल रूप से एकीकृत हो चुकी हैं.

प्रस्तावित समाधान: नए अधिनियम में भू-स्थानिक तकनीक (Geospatial Technology) और AI आधारित प्रणालियों के जरिये यह तय करने की बात कही गई है कि कहां, कितना और किस काम के लिए धन आवंटित किया जाए.

वास्तविकता: मनरेगा का खुला और मांग-आधारित स्वरूप उसकी सबसे बड़ी ताकत है, क्योंकि यह स्थानीय संदर्भों के प्रति संवेदनशील है. आज की भू-स्थानिक और AI तकनीकें सामाजिक–पारिस्थितिक प्रणालियों की जटिलताओं को पूरी तरह समझने या पकड़ने में सक्षम नहीं हैं और शायद कभी हों भी नहीं.

ये प्रणालियां केवल भौतिक परिदृश्यों से नहीं, बल्कि मौसमी श्रम प्रथाओं, परंपरागत व अनौपचारिक अधिकारों, स्थानीय इतिहास, पर्यावरणीय क्षरण और पुनर्स्थापन, समुदाय की प्राथमिकताओं तथा आपसी सहमतियों से आकार लेती हैं, जो अक्सर रिमोट सेंसिंग या एल्गोरिदम में अदृश्य रह जाती हैं.

समुदायों के पास इन सभी पहलुओं का ऐसा स्थानीय ज्ञान होता है, जिसे पूरी तरह डेटा या मॉडलों में बदला नहीं जा सकता. डिजिटल और डेटा-आधारित प्रणालियां सहायक भूमिका निभा सकती हैं, लेकिन वे अधूरी होती हैं और उन्हें स्थानीय ज्ञान और समुदाय की इच्छा-शक्ति से जोड़ना अनिवार्य है. केवल केंद्रीकृत, मानक-आधारित आवंटन प्रणाली पर निर्भरता से गलत आवंटन, अक्षमता और असमानता का खतरा बढ़ जाता है.

वास्तविकता (लोकतांत्रिक पक्ष): मनरेगा का मांग-आधारित स्वरूप उसके अधिकार-आधारित रोजगार गारंटी कानून से उपजा एक क्रांतिकारी विचार है. यह स्थानीय लोकतंत्र के लिए जगह बनाता है, जहां गरीब अपने अधिकारों की मांग कर सकता है, हाशिये पर खड़े लोग अपनी मौजूदगी दर्ज करा सकते हैं और अल्पसंख्यक अपनी आवाज़ उठा सकते हैं.

मानक-आधारित (नॉर्मेटिव) डिजाइन इस लोकतांत्रिक जगह को कमजोर करता है और गरीबों पर यह बोझ डालता है कि वे पहले वैकल्पिक प्रस्ताव दें, बजाय इसके कि नीति निर्माण की शुरुआत ही उनकी बात सुनने से हो.

अनेक अध्ययनों से साबित हुआ है कि मनरेगा ने गरीबों को प्रशासन से जवाबदेही, स्थानीय प्रभुत्वशाली वर्ग से समानता और समुदाय के भीतर आपसी सम्मान की मांग करने का आधार दिया है, जो नए प्रावधानों में कहीं गुम होता हुआ दिखाई देता है.

सही रास्ता: मनरेगा के खुले और मांग-आधारित स्वरूप को हर हाल में बनाए रखा जाना चाहिए. तकनीक का उपयोग तभी हो, जब वह समुदायों को सशक्त करे, ताकि वे अपने संसाधनों को बेहतर समझ सकें, टिकाऊ योजनाएं बना सकें और अपने आवंटन की मांग स्वयं रख सकें. अधूरी समस्या-समझ के आधार पर तकनीक को जबरन समाधान के रूप में थोपना होगा और जमीनी सच्चाई को नजरंदाज करना भी.

2. संसाधनों का दुरुपयोग (Misappropriation of resources)

बताई गई समस्या: मैदान में काम न दिखना, खर्च और भौतिक प्रगति में मेल न होना, श्रम-प्रधान कार्यों में मशीनों का उपयोग और डिजिटल उपस्थिति प्रणाली को दरकिनार करना.

प्रस्तावित समाधान: NMMS ऐप, संरचनाओं की जियो-टैगिंग, बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण और साप्ताहिक सार्वजनिक खुलासे (मस्टर रोल, भुगतान, स्वीकृति, निरीक्षण, शिकायतें आदि).

वास्तविकता: दुरुपयोग को केवल निगरानी या प्रमाणीकरण की विफलता मानना मूल समस्या को न समझना है. दुरुपयोग अक्सर वहां होता है, जहां जरूरतमंद समुदाय मनरेगा से प्रभावी ढंग से जुड़ नहीं पाते. इसके कारण हैं:

1. जटिल दिशानिर्देश, जिन्हें समझकर ग्राम सभा में मांग रखना कठिन होता है.

2. सामग्री और उसके लागत की भुगतान की अव्यवस्थित प्रक्रिया, जिससे गरीबों को अग्रिम पूंजी की जरूरत पड़ती है.

3. कम मजदूरी दर और भुगतान में देरी.

4. डिजिटल उपस्थिति जैसे औजारों से महिलाओं की भागीदारी पर नकारात्मक असर.

जहां समुदायों को सही सहयोग मिला – मांग दर्ज कराने, समय पर भुगतान, और सामाजिक एकत्रीकरण और स्वीकार्य में – वहां मनरेगा परिवर्तनकारी साबित हुआ है और दुरुपयोग न्यूनतम रहा है.

सही रास्ता: हाशिये के समूहों की भागीदारी बढ़ाने और पारदर्शिता तक उनकी पहुंच मजबूत करने की जरूरत है. केवल तकनीकी नियंत्रण और कठोर प्रक्रियाएं समाधान नहीं हैं. असली समाधान समुदायों को सशक्त बनाना है, ताकि मनरेगा ग्रामीण लचीलापन और समानता के अपने लक्ष्य पूरे कर सके.

3. श्रम उपलब्धता (Labour availability)

बताई गई समस्या: बुवाई और कटाई के मौसम में मनरेगा के कारण खेतों में श्रमिकों की कमी.

प्रस्तावित समाधान: साल में 60 दिन ऐसे तय करना, जब रोजगार उपलब्ध नहीं होगा.

वास्तविकता: यह धारणा गलत है कि मनरेगा कृषि से श्रम छीनता है. मनरेगा की मजदूरी दरें अक्सर कृषि मजदूरी से 40-50% कम होती हैं. ऐसे में कोई भी श्रमिक अधिक मजदूरी छोड़कर कम मजदूरी वाला काम नहीं करेगा. मनरेगा वास्तव में एक ‘फॉलबैक’ विकल्प है, जब खेतों में काम नहीं मिलता या शोषणकारी हालात होते हैं.

कृषि श्रम की कमी के असली कारण शहरी पलायन और खेती में बढ़ती अस्थिरता हैं. किसान संगठनों ने भी 60 दिन के ब्लैकआउट का विरोध किया है.

सही रास्ता: मनरेगा को केवल अकुशल श्रम तक सीमित न रखकर कौशल-आधारित कार्यों – जैसे जल स्रोतों और वनों की निगरानी, जल गुणवत्ता डेटा संग्रह, सिंचाई प्रबंधन – तक विस्तारित किया जा सकता है. इससे कृषि को लाभ होगा, ग्रामीण युवाओं को स्थानीय रोजगार मिलेगा और पलायन रुकेगा.

अन्य गंभीर चिंताएं

मनरेगा में केंद्र–राज्य वित्तीय हिस्सेदारी 90:10 थी. नए अधिनियम में इसे 60:40 किया गया है. साथ ही राज्य द्वारा तय मानक से अधिक खर्च का बोझ भी राज्यों पर डाला गया है. इससे राज्यों में काम की मांग दबने और बेरोजगारी तथा पलायन बढ़ने का खतरा है.

इसके अलावा, नए कानून में केंद्र सरकार को अत्यधिक विवेकाधीन शक्तियां दी गई हैं, जिससे स्थानीय स्वायत्तता और संघीय ढांचा कमजोर होता है. 125 दिनों के रोजगार का वादा भी भ्रामक है, क्योंकि मौजूदा संसाधनों में औसत रोजगार 50 दिन ही है.

यह अधिनियम समस्याओं की गलत समझ पर आधारित है और ऐसे समाधान सुझाता है, जो दो दशकों में मनरेगा से मिली सामाजिक और लोकतांत्रिक उपलब्धियों को नष्ट कर देंगे. इसलिए जरूरी है कि सरकार तत्काल नागरिक समाज संगठनों, शोधकर्ताओं और मैदानी कार्यकर्ताओं से व्यापक परामर्श करे और यह समझे कि मनरेगा कहां, कब और क्यों काम करता है, ताकि उसी आधार पर सुधार किए जा सकें, न कि उसे समाप्त किया जाए.

इन लोगों ने पत्र को दिया समर्थन

इस खुले पत्र को 350 से अधिक वैज्ञानिकों, शिक्षाविदों, नागरिक समाज संगठनों, ज़मीनी और अधिकार कार्यकर्ताओं ने अपना समर्थन दिया है. इसमें इंस्टिट्यूट फॉर डेवलपमेंट एंड कम्युनिकेशन, चंडीगढ़ के प्रो. सुनील कुमार सिन्हा, आईआईटी दिल्ली की स्तुति खन्ना, नरेगा वॉच संगठन के ​शशिकांत महतो, Krea यूनि​वर्सिटी के सायनदेब चौधुरी, पर्यावरणविद् सत्यजीत महताब, मनरेगा वॉच बिहार के संजय साहनी, जेएनयू की रिटायर प्रो. तनिका सरकार, राइट टू फूड कैम्पेन के समित पंडा, आईआईटी दिल्ली की शिक्षक सिमोना साहनी, सामाजिक कार्यकर्ता सफदर अली, हिंदू कॉलेज की रिटायर शिक्षक रेखा बसु, सामाजिक कार्यकर्ता रफी अहमद, लेखक राधा कुमार, पीयूसीएल के प्रसाद चाको, ऑल इंडिया वर्कर्स फोरम की प्रांजली त्रिपाठी आदि शामिल हैं.

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