मसूरी वन प्रभाग से 7,000 से ज़्यादा बाउंड्री पिलर गायब, उत्तराखंड हाईकोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब

(प्रतीकात्मक फोटो साभार: Pixabay)

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मसूरी वन प्रभाग से 7,000 से ज़्यादा बाउंड्री पिलर गायब होने का मामला उत्तराखंड हाईकोर्ट पहुंच गया है. बीते 24 दिसंबर को इस मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय और राज्य सरकार समेत अन्य पक्षों से जवाबी हलफनामा दाखिल करने को कहा है.

नरेश चौधरी द्वारा दायर एक जनहित याचिका के बाद जस्टिस सुभाष उपाध्याय और मनोज कुमार तिवारी की पीठ ने इस मामले की सुनवाई की.

व्यावसाहिक हित

चौधरी ने कहा कि 7,375 बाउंड्री पिलर्स का गायब होना, जो पूरे मसूरी वन प्रभाग में कुल पिलर्स का 60 प्रतिशत से ज़्यादा है, अप्रत्याशित है. यह जान-बूझकर दखलअंदाजी, वहां तैनात अधिकारियों की संभावित मिलीभगत और प्रभावशाली राजनीतिक या व्यावसाहिक हितों द्वारा संभावित संरक्षण का साफ संकेत है.

उन्होंने दावा किया कि इन पिलर्स को हटाने या उनकी जगह बदलने से जंगल की ज़मीन पर अवैध कब्ज़ा और गैर-वानिकी इस्तेमाल हुआ है, जो सरकारी संपत्ति के मामले में विश्वास तोड़ने का एक आपराधिक मामला है और यह क्षेत्र की पारिस्थितिकी सुरक्षा के लिए एक गंभीर खतरा है, जैसा इस साल की अभूतपूर्व प्राकृतिक आपदा में नजर भी आया था.

अवैध निर्माण का विस्तार

द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि पिछले कुछ दशकों में मसूरी में ज़मीन पर कब्जा, अवैध निर्माण और रियल-एस्टेट का विस्तार हुआ है. बीते 22 दिसंबर को ऋषिकेश में कथित अतिक्रमण के एक मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि राज्य के अधिकारी अपनी आंखों के सामने हो रहे जंगल की जमीन पर कब्जे को चुपचाप देख रहे हैं.

मसूरी वन सीमांकन पर याचिका में कहा गया है कि मसूरी और रायपुर रेंज में गायब बाउंड्री पिलर की ज़्यादा संख्या इस तरह के व्यवस्थित तरीके से गायब होने के पीछे के मकसद को पूरी तरह से साफ करती है. यह मामला इसी साल उत्तराखंड वन विभाग की कार्य योजना इकाई द्वारा की गई विस्तृत जांच के दौरान सामने आया.

CBI जांच की मांग

एक पत्र में मुख्य वन संरक्षक (कार्य योजना) ने वन बल के प्रमुख (Head of Forest Force) को बताया कि 7,375 बाउंड्री पिलर, जो आधिकारिक नक्शे पर दिखाए गए थे, वे ज़मीन पर गायब मिले. मुख्य वन संरक्षक ने राजनीतिक समर्थन और वन अधिकारियों की मिलीभगत के बारे में चिंता जताई और अदालत की देखरेख में एक विशेष जांच दल बनाने या CBI जांच शुरू करने की सिफारिश की है.

रिपोर्ट के अनुसार, मुख्य वन संरक्षक (कार्य योजना) ने यह भी सिफारिश की कि गायब पिलरों की जगह दो से तीन साल की तय समय सीमा के अंदर सही बाउंड्री पिलर फिर से लगाए जाएं.

अधिकारियों की मिलीभगत

मुख्य वन संरक्षक (कार्य योजना) के एक दूसरे पत्र में मसूरी वन प्रभाग के संभागीय वन अधिकारी (DFO) की निजी रियल-एस्टेट संपत्ति में तीन राज्यों में हुई भारी बढ़ोतरी की बात कही गई थी. मुख्य वन संरक्षक ने फिर से तुरंत दखल देने की मांग की थी, जिसमें गायब होने के हालात की जांच के लिए और संबंधित समय के दौरान तैनात सभी अधिकारियों, जिनमें मुख्य वन संरक्षक, वन संरक्षक और संबंधित संभागीय वन अधिकारी शामिल हैं, की संपत्तियों की जांच के लिए अदालत की देखरेख में एक SIT या CBI जांच का गठन शामिल था.

इन चिट्ठियों के बाद केंद्र सरकार ने अगस्त 2025 में इस मामले की जांच के आदेश दिए.

मौजूदा याचिका में CBI को मसूरी वन प्रभाग से गायब हुए बाउंड्री पिलर्स की व्यापक, स्वतंत्र और समयबद्ध जांच करने के निर्देश देने की प्रार्थना की गई है.

सटीक सीमांकन कराया जाए

रिपोर्ट के अनुसार, याचिका में सर्वे ऑफ इंडिया को भी निर्देश देने की मांग की गई है कि वह प्रभाग के सभी वन क्षेत्रों की सीमाओं का आधुनिक सर्वे टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करके एक व्यापक, वैज्ञानिक और जियो-रेफरेंस्ड सर्वे करे, ताकि सटीक सीमांकन हो सके और प्रामाणिक नक्शे तैयार किए जा सकें, सभी गायब बाउंड्री पिलर्स की सही जगह का पता लगाया जा सके और उन्हें फिर से लगाया जा सके.

अन्य प्रार्थनाओं में इसमें उत्तराखंड में राजस्व अधिकारियों के पास मौजूद या उनके नियंत्रण वाली सभी वन भूमि को वन विभाग को ट्रांसफर करने के निर्देश देने की भी मांग की गई है.

दिशानिर्देशों के उल्लंघन

याचिका में मसूरी के जंगलों की सुरक्षा और संरक्षण की ज़रूरत पर ज़ोर दिया गया, जो राष्ट्रीय स्तर पर पारिस्थितिक और जल विज्ञान के लिहाज़ से बहुत महत्वपूर्ण क्षेत्र है. इसमें वन संरक्षण अधिनियम, 1980 और टीएन गोदावरमन तिरुमुलपाद फैसले में दिए गए दिशानिर्देशों के उल्लंघन का ज़िक्र किया गया.

याचिका में कहा गया है, ‘इस तरह के पारिस्थितिकी अपराधों के विनाशकारी असर इस साल सितंबर में आई अप्रत्याशित बाढ़ में पहले ही देखे जा चुके हैं, जिसका असर इतना ज़्यादा था कि मसूरी-देहरादून के बीच संपर्क पूरी तरह से ठप हो गया था और रास्ते में फंसे हुए पर्यटकों को बचाने के लिए बचाव अभियान चलाना पड़ा था. इस तरह की कब्जे वाली जंगल की ज़मीन पर लापरवाही से निर्माण के कारण मसूरी में भूस्खलन की घटनाओं में काफी बढ़ोतरी हुई है.’

याचिका में यह भी कहा गया है कि वाडिया इंस्टिट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के एक अध्ययन से पता चला है कि मसूरी और उसके आसपास के लगभग 15 प्रतिशत इलाके उच्च जोखिम वाले भूस्खलन क्षेत्र में आते हैं.

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