Internet Shutdowns in India: भारत ने साल 2025 में 65 बार इंटरनेट बंद किया, जो 2017 के बाद से देश में दर्ज की गई सबसे कम संख्या है. हालांकि, वैश्विक डिजिटल अधिकार समूह Access Now की ओर से जारी एक नई रिपोर्ट के अनुसार, यह आंकड़ा ‘एक लोकतंत्र के लिए चिंताजनक रूप से अधिक’ बना हुआ है.
‘Rising Repression Meets Global Resistance: Internet Shutdowns in 2025’ शीर्षक वाली यह रिपोर्ट पिछले साल 52 देशों में 313 बार जान-बूझकर किए गए इंटरनेट पर प्रतिबंध लगाने का दस्तावेज़ है. साल 2016 में Access Now द्वारा इस तरह का आंकड़ा इकट्ठा करना शुरू करने के बाद से यह अब तक का सबसे ज़्यादा आंकड़ा है.
भारत से आगे म्यांमार
हालांकि म्यांमार (Myanmar) लगातार दूसरे साल इंटरनेट प्रतिबंध के 95 मामलों के साथ दुनिया में इंटरनेट शटडाउन करने वाले देशों में भारत से आगे निकल गया है, फिर भी भारत का कुल ऐतिहासिक आंकड़ा वैश्विक स्तर पर सबसे ज़्यादा बना हुआ है.
इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, 2016 से अब तक Access Now द्वारा दुनिया भर में दर्ज किए गए 2,102 इंटरनेट शटडाउन में से 920 भारत में हुए हैं.
संगठन की ओर से जुटाए गए आंकड़ों से पता चलता है कि पिछले एक दशक में भारत में नेटवर्क में रुकावटों का ट्रेंड उतार-चढ़ाव भरा, लेकिन लगातार ऊंचा रहा है.
भारत में साल दर साल आंकड़ा
भारत में 2016 में 30 बार इंटरनेट शटडाउन हुए, जो 2017 में बढ़कर दोगुने से भी ज़्यादा यानी 69 हो गए. 2018 में यह संख्या अपने चरम पर पहुंचकर 134 हो गई, जिसके बाद 2019 में 121, 2020 और 2021 में 108-108, 2022 में 85, 2023 में 116 और 2024 में 84 इंटरनेट शटडाउन हुए और फिर 2025 में यह संख्या घटकर 65 रह गई.
रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में हुई 65 बार इंटरनेट प्रतिबंध ने पूरे भारत के 12 राज्यों और क्षेत्रों को प्रभावित किया. ये प्रतिबंध मुख्य रूप से ‘विरोध प्रदर्शनों, संघर्षों, सांप्रदायिक हिंसा और धार्मिक त्योहारों’ के दौरान लागू की गई थीं.
लोगों की आवाज़ पर नियंत्रण
रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत दुनिया भर में एक अपवाद है, क्योंकि ‘तकनीकी रूप से इंटरनेट पर प्रतिबंध के आदेश कानून के तहत किए जाने चाहिए.’ इस प्रक्रियागत ज़रूरत के बावजूद Access Now ने कहा कि भारत ‘लोगों की आवाज़ पर नियंत्रण को ही चुनता रहता है और इस बात को नहीं मानता कि इंटरनेट शटडाउन मूल रूप से लोकतंत्र के साथ मेल नहीं खाते.’
यह रिपोर्ट अधिकारियों द्वारा वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क (VPN) जैसे इंटरनेट प्रतिबंधों से बचने वाले टूल्स को निशाना बनाने के बढ़ते चलन पर भी प्रकाश डालती है. VPN ऐसे सॉफ्टवेयर एप्लीकेशन हैं, जो यूज़र्स को अपनी ऑनलाइन पहचान और लोकेशन छिपाकर स्थानीय इंटरनेट प्रतिबंधों को दरकिनार करने की सुविधा देते हैं.
जम्मू कश्मीर का हाल
रिपोर्ट में बताया गया है कि 29 दिसंबर 2025 को जम्मू-कश्मीर ने ‘भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता’ की धारा 163 का इस्तेमाल किया – यह एक ऐसा प्रावधान है, जिसका इस्तेमाल मजिस्ट्रेट सार्वजनिक शांति बनाए रखने के लिए निषेधाज्ञा जारी करने के लिए करते हैं – और इसके तहत ‘अनाधिकृत VPN के इस्तेमाल पर दो महीने का प्रतिबंध’ लगा दिया गया.
इस आदेश के बाद पुलिस ने कथित तौर पर लगभग 800 यूज़र्स पर जुर्माना लगाया; इस सख़्त कार्रवाई में ‘प्रतिबंधित ऐप्स की तलाश के लिए फोन की तलाशी’ भी शामिल थी.
11 देशों में 195 बार प्रतिबंध
वैश्विक स्तर पर, एशिया-प्रशांत क्षेत्र में इन रुकावटों का सबसे बड़ा हिस्सा रहा, जहां 11 देशों में 195 बार इंटरनेट शटडाउन हुए. Access Now ने कहा कि इस क्षेत्र के लोकतंत्र ‘अशांति के जवाब में डिफॉल्ट प्रतिक्रिया के तौर पर शटडाउन पर ही निर्भर रहते हैं.’
पाकिस्तान में हुए 20 शटडाउन का उदाहरण देते हुए संगठन ने कहा कि यह ‘विरोध प्रदर्शनों, धार्मिक आयोजनों और राजनीतिक रूप से संवेदनशील मौकों पर कनेक्टिविटी काटने की प्रक्रिया के लगातार सामान्य होते जाने’ का एक और उदाहरण है, जिसमें अक्सर बहुत कम पारदर्शिता या जवाबदेही होती है.
मानवाधिकारों का उल्लंघन
106 देशों के 366 से ज़्यादा संगठनों के गठबंधन की ओर से Access Now द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट में यह निष्कर्ष निकाला गया है कि नियंत्रण स्थापित करने और मानवाधिकारों के उल्लंघन को छिपाने के लिए इंटरनेट बंद करने का इस्तेमाल गहरा नुकसान पहुंचा रहा है. इस गठबंधन ने दुनिया भर की सरकारों से आग्रह किया कि वे इस बात को स्वीकार करें कि ‘जान-बूझकर किए जाने वाले इंटरनेट प्रतिबंधों को कभी भी सामान्य नहीं माना जाना चाहिए’.



